निश्चय-व्यवहार
- 1 hour ago
- 6 min read

जिनशासन की एक अनुपम विशेषता है – धर्म (या गुण) के निश्चय और व्यवहार, ऐसे दो प्रकार बताए गए हैं।
आत्मा में प्रकट होने वाला गुण (या नाश होने वाला दोष) – वह निश्चय है।
उसे प्रकट करने के लिए आवश्यक ऐसी बाहरी क्रिया, या यदि गुण प्रकट ही हो, तो उससे स्वाभाविक रूप से बाहर होती हुई क्रिया – वह व्यवहार है।
दृष्टांतों से यह विषय स्पष्ट होगा।
व्यवहार नय ऐसा कहेगा कि जो साधु का वेश पहनता है, जिसमें साधु के आचारों का पालन दिखता है, वह साधु है।
निश्चय नय ऐसा कहेगा कि जिसमें महाव्रतों के पालन की परिणति है, छठे–सातवें गुणस्थान के अध्यवसाय है, वह साधु है।
व्यवहार नय भीतर की परिणति नहीं देखता। अर्थात्, जिसमें परिणति नहीं है, केवल बाह्य आचरण है, उसे भी साधु मानता है।
निश्चय नय बाह्य आचरण नहीं देखता। अर्थात्, जिसमें परिणति है, उसमें आचरण या वेश न हो, तो भी उसे साधु मानता है।
मेरे अंदर गुरुदेव के प्रति श्रद्धा, सम्मान, समर्पण (आज्ञापालन की तत्परता) हो — वह निश्चय से गुरुभक्ति है।
मैं गुरुदेव के वस्त्रों का पड़िलेहण करुं, गोचरी-पानी आदि की भक्ति करुं, कपड़े का काप निकालूं, बुलाए तो ‘जी’ कहकर हाथ जोड़कर खड़ा रहूँ, आए तो खड़ा हो जाऊँ… आदि व्यवहार से गुरुभक्ति है।
आपके हृदय में परमात्मा के प्रति श्रद्धा, सम्मान, प्रभु के वचन पर श्रद्धा आदि हो — वह निश्चय से प्रभुभक्ति है।
प्रभु की अष्टप्रकारी पूजा, तीर्थयात्रा, अभिषेक, अंगरचना आदि करना… प्रतिष्ठा आदि में बोली बोल के लाभ लेना… आदि व्यवहार से प्रभुभक्ति है।
अंदर खाने की लालसा और स्वाद की आसक्ति न होना — वह निश्चय से तप-त्याग है।
उपवास-आयंबिल आदि व्यवहार से तप-त्याग है।
व्यवहार नय से पैसे देना, वह दान है।
निश्चय नय से मूर्छा को तोड़ने का परिणाम हो, वही त्याग है।
निश्चय और व्यवहार के बीच संबंध है भी, और नहीं भी है।
संबंध नहीं है — यह बात पहले देखते हैं।
बाह्य आचार-वेश होने के बावजूद, अंदर साधुत्व की परिणति न हो – ऐसा हो सकता है।
जैसे अभव्य होने पर भी अंगारमर्दक आचार्य थे, साधुवेश था, आचार का पालन था; लेकिन सम्यक्त्व न होने के कारण साधुत्व की परिणति नहीं थी।
बाह्य त्याग करने के बावजूद अंदर आसक्ति तोड़ने का परिणाम न हो – ऐसा हो सकता है। आप पर्वतिथि पर लीलोतरी छोड़ते हैं, लेकिन अंदर आसक्ति तोड़ने का परिणाम नहीं होता। इसलिए ‘आज कहाँ पर्वतिथि आई ?’ ऐसी अरुचि होती है।
गतानुगतिकता से पूजा करता हो किंतु अंदर सम्मानभाव न हो, ऐसा भी कभी हो सकता है।
तप करने पर भी खाने की लालसा पर थोड़ा भी नियंत्रण न हो, ऐसा भी कभी हो सकता है।
अंदर परिणति होने के बावजूद बाहर आचार न हो – ऐसा कभी ही होता है, लेकिन हो सकता है, क्योंकि ऐसे संयोग-सामग्री-शक्ति नहीं होते...
हमारे शास्त्रों में साधुओं का एक प्रकार बताया है – प्रत्येकबुद्ध। उन्हें जातिस्मरणज्ञान आदि से साधुपन के परिणाम जागृत होते हैं। लेकिन साधुवेश पहनना जरूरी नहीं है। (इसके कारण भी शास्त्रो में बताए हैं।)
त्याग करने की भावना होने के बावजूद लिक्विडिटी न होने से दान न कर सके, ऐसा हो सकता है।
प्रभु के प्रति सम्मानभाव प्रचंड होने के बावजूद, शारीरिक स्थिति के कारण पूजा न कर सके, ऐसा हो सकता है।
तप करने की प्रबल इच्छा होने के बावजूद शरीर अनुकूल न होने से तप न कर सके, ऐसा हो सकता है।
दीक्षा लेने की प्रबल इच्छा होने के बावजूद दीक्षा न ले सके, ऐसा भी हो सकता है।
मेरे हृदय में मेरे गुरुदेव के प्रति भक्ति हो तो भी अभी मैं अपने गुरुदेव से 500 किलोमीटर दूर होने के कारण व्यवहार से कोई भक्ति करने का अवसर नहीं मिल पाता...
इस तरह निश्चय-व्यवहार के बीच संबंध न हो - ऐसा भी हो सकता है।
उसी तरह, दोनों के बीच संबंध है भी ।
अंदर परिणाम हो, तो उसके जीवन में यथाशक्ति बाह्य प्रवृत्ति प्रायः आती ही है।
मेरे अंदर गुरुदेव के प्रति भक्तिभाव हो, तो उनकी पडिलेहन आदि भक्ति करने का प्रयास मैं अवश्य करुंगा।
तप का परिणाम हो, तो यथाशक्ति तप किए बिना नहीं रहूँगा।
बाह्य प्रवृत्ति करे, उसमें आंतरिक परिणाम न हो, तो आता है; हो, तो बढ़ता है, विशुद्ध होता है, दृढ़ होता है।
जैसे-जैसे मैं गुरुदेव की सेवा करुंगा, वैसे-वैसे मेरा भक्तिभाव बढ़ेगा।
तप के परिणाम बिना भी बाहरी तप करे, तो अभ्यास से धीरे-धीरे तप का परिणाम पैदा होता है।
साधु के आचारो का पालन करते-करते साधुत्व के परिणाम जागते हैं।
राग होता हो ऐसे द्रव्यों का निरंतर त्याग करने से धीरे-धीरे राग घटता है।
इस तरह दोनों के बीच संबंध है।
व्यवहार के पालन से नैश्चयिक गुण की प्राप्ति होती है।
यदि नैश्चयिक गुण हो, तो व्यवहार का पालन सहज रूप से होता है।
निश्चय से आराधना न हो तो पाने के लिए, हो तो स्थिर करने, दृढ़ करने, बढ़ाने, निर्मल करने के लिए व्यवहार से आराधना करनी आवश्यक है।
जैसे अंदर स्वाद की आसक्ति हो तो बार-बार आयंबिल करने से आसक्ति घटती है, टूटती है।
प्रश्न यह होता है कि अंदर के दोष ही कम करने हैं, तो बाहरी क्रिया की क्या जरूरत है ?
इसके जवाब में मैं ऐसा प्रश्न करूँगा कि मिठाई में मिठास चाहिए, तो शक्कर की क्या जरूरत ?
प्रश्न : दोनों एक ही तो हैं ना ?
नहीं। मिठास तो गुड़ से भी आ सकती है, गन्ने के रस से भी आ सकती है।
मिठाई में जरूरी मिठास होती है। फिर भी जिससे मिठास आए, ऐसी कोई चीज़ तो डालनी ही पड़ती है, उसके बिना मिठास नहीं आती।
वैसे ही, दोष को कम करना हो, तो जिससे दोष घटे, ऐसी आराधना करनी ही पड़ती है।
कोई भी आराधना किए बिना दोष कम नहीं हो सकते।
बाहरी निमित्तों का प्रभाव, आंतरिक परिणाम पर पड़े बिना नहीं रहता।
जीभ पर मिठाई न रखो, तब तक राग न हो, यह संभव है।
जीभ पर मिठाई रखने के बाद भी छद्मस्थ को राग न हो, यह प्रायः असंभव है।
निश्चय नय से तो मिठाई में मिठास ही चाहिए।
पर व्यवहार नय से उसके लिए शक्कर डालना आवश्यक हो ही जाता है।
वैसे ही, निश्चय नय से दोष ही घटाने है तो भी, व्यवहार नय से उसके लिए आराधना आवश्यक हो जाती है।
निश्चय-व्यवहार दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं, एक-दूसरे की ऊँगली पकड़कर चलने वाले हैं।
मान लो कि किसी को रसगुल्ला पर तीव्र राग है। वह राग घटाना निश्चय से आराधना है।
इसके लिए क्या करना पड़ेगा ? रसगुल्ला का त्याग करना पड़ेगा। वह व्यवहार से आराधना है।
रसगुल्ला के उपर का राग, खाने से घटेगा या बढ़ेगा ?
खाने से तो वह राग तीव्र होगा, उसके संस्कार और अधिक पुष्ट होंगे। भले थोड़े समय के लिए उसकी इच्छा शांत हो, लेकिन वह पुष्ट संस्कार और ज़ोर से जाग्रत होंगे, और अधिक राग होगा।
यह बात आपको इस तरह समझ आएगी
रसगुल्ला पर राग कैसे उत्पन्न हुआ ? जन्म से तो रसगुल्ला को जानता नहीं था।
जब तक रसगुल्ला क्या है ? यह पता न हो, उसे चखा भी न हो, तब तक उस पर राग नहीं होता। ऐसा भी होता है कि कोई रसगुल्ला खाने की पेशकश करे, तो भी उसे ठुकरा दे। लेकिन एक बार खाया, जीभ को उसका स्वाद लगा, फिर राग उत्पन्न हुआ, दो-चार बार खाने से राग तीव्र हुआ।
इसलिए यह स्पष्ट है कि खाने से राग बढ़ता है, भले ही तत्क्षण इच्छा शांत हुई दिखती है।
कोई भी सामग्री के भोग से उसका राग पुष्ट होता है, त्याग करने से ही राग के संस्कार घटते हैं। इसलिए, निश्चय को प्राप्त करने के लिए, त्याग रूपी व्यवहार अनिवार्य है।
अपनी आराधना में निश्चय लगाना चाहिए।
अर्थात्, केवल आचरण का पालन करके संतुष्ट नहीं होना चाहिए, अपने आप को धार्मिक नहीं मानना चाहिए । परिणति आई है या नहीं ? यह देखना चाहिए। उसे लाने का प्रयास करना चाहिए ।
परिणति न हो तो मैं ‘सच्चा धार्मिक नहीं’ ऐसा मानना चाहिए । गर्व नहीं करना चाहिए ।
दूसरे आराधकों के जीवन में व्यवहार देखना चाहिए, निश्चय की नहीं करनी चाहिए।
दान करता है, तो उसकी अनुमोदना करनी चाहिए । उसका लोभकषाय या परिग्रह-संज्ञा नहीं देखनी चाहिए ।
तप करता है, तो उसकी अनुमोदना करनी चाहिए । उसकी आहार-संज्ञा या रसना की गुलामी नहीं देखनी चाहिए ।
एक ही नैश्चयिक गुण को प्राप्त करने के लिए, संयोगों के अनुसार व्यवहार अलग-अलग हो सकता है।
जो नैश्चयिक गुण का प्रापक बने, ऐसा ही व्यवहार जिनशासन मान्य करता है।
जो नैश्चयिक गुण का प्रापक न बने, या उसका घातक बने — ऐसे व्यवहार को जिनशासन मान्य नहीं करता।
अर्थात्, देखने में वह धर्म जैसा प्रतीत होता हो फिर भी, जिनशासन उसे 'धर्म' नहीं मानता।
जैसे कि ली गई प्रतिज्ञा का पालन करने पर यदि तीव्र असमाधि उत्पन्न हो ऐसी परिस्थिति आ जाए; तो जिनशासन उस प्रतिज्ञा के (दिखने वाले) पालन को धर्म नहीं मानता, उस अवसर पर प्रतिज्ञा के (दिखने वाले) भंग को ही धर्म मानता है। (सर्व-समाधि-आगार)
उसी प्रकार, ली गई प्रतिज्ञा का पालन करने पर यदि समस्त संघ/शासन को हानि पहुँचने जैसी परिस्थिति आ जाए; तो जिनशासन उस प्रतिज्ञा के (दिखने वाले) पालन को नहीं, बल्कि उसके (दिखने वाले) भंग को ही धर्म मानता है... (महत्तरागार)।
आराधना के लिए आवश्यक उपकरण रखना — उसे जिनशासन ‘परिग्रह’ नहीं मानता। उसमें दिखने में (व्यवहार से) परिग्रह है; लेकिन वास्तविक रूप से (निश्चय से) परिग्रह नहीं है; क्योंकि उपकरणों के सदुपयोग से आत्मा के दोष घटते हैं, गुण प्रकट होते हैं।
गुण के लिए ऐसी स्पष्ट समझ... निश्चय-व्यवहार ऐसे दो भेद... निश्चय के प्रापक बनते व्यवहार का ही धर्म के रूप में स्वीकार... निश्चय के घातक बनते व्यवहार का धर्म के रूप में अस्वीकार...
यह सब केवल और केवल जिनशासन में ही है। अन्य दर्शनों के पास ऐसी स्पष्ट समझ है ही नहीं...
है ना मेरा जिनशासन महान् !










Comments