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The Faithbook Blog


द्रव्य - व्यवस्था
दान के रूपमें प्राप्त (या धार्मिक सम्पत्तियों से आय रूप में प्राप्त) धार्मिक संपत्ति की व्यवस्था किस प्रकार करनी चाहिए ? इसकी एक सुदृढ़ व्यवस्था जिनशासन में है, जो अन्य किसी भी दर्शन में देखने को नहीं मिलती। अन्य दर्शनों में मंदिरों में आने वाली दान-पेटियों की आय के मालिक, मंदिर के मालिक या पुजारी बन जाते हैं... और मंदिर को अपने जीवन-निर्वाह (या ऐशो-आराम) का साधन बना देते हैं। लेकिन जिनशासन में एक अटूट सिद्धांत है – जिस कार्य के लिए दान प्राप्त हुआ हो, उसी (या वैसे ही) कार्य

Pujya Panyas Shri Bhavyasundar Vijayji Maharaj
Sep 222 min read


निश्चय-व्यवहार
जिनशासन की एक अनुपम विशेषता है – धर्म (या गुण) के निश्चय और व्यवहार, ऐसे दो प्रकार बताए गए हैं। आत्मा में प्रकट होने वाला गुण (या नाश होने वाला दोष) – वह निश्चय है। उसे प्रकट करने के लिए आवश्यक ऐसी बाहरी क्रिया, या यदि गुण प्रकट ही हो, तो उससे स्वाभाविक रूप से बाहर होती हुई क्रिया – वह व्यवहार है। दृष्टांतों से यह विषय स्पष्ट होगा। व्यवहार नय ऐसा कहेगा कि जो साधु का वेश पहनता है, जिसमें साधु के आचारों का पालन दिखता है, वह साधु है। निश्चय नय ऐसा कहेगा कि जिसमें महाव्रतों के पा

Pujya Panyas Shri Bhavyasundar Vijayji Maharaj
May 136 min read


बड़ा रूप दे दो
चिंटू: “पिंटू! लोगों का ध्यान खींचने के लिए क्या करना चाहिए?” पिंटू: “किसी भी छोटी सी बात को बड़ा स्वरूप दे दो!” इतने में नौकर चाय लेकर...

Aacharya Shri Ajitshekhar Suriji Maharaj Saheb
Mar 5, 20252 min read


सारे भगवान की जय
चिंटू : “पिंटू! तू मेरा भी रिजल्ट देख कर आना। मैं पापा के साथ बैठा रहूँगा। यदि एक विषय में फेल हुआ तो जय श्रीकृष्ण कहना, दो विषय में उड़ा...

Aacharya Shri Ajitshekhar Suriji Maharaj Saheb
Oct 16, 20242 min read
From the significance of daily rituals to the profound teachings of Jainism,
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