top of page

जैनत्व वेदना… जैनत्व संवेदना… Part 4



जहाँ-जहाँ पर विहार करके गया और जिन-जिन संघों में प्रवचन किया, वहाँ पर मैंने जब-जब एक प्रश्न सभा से पूछा, कि, अपने जैन धर्म का मुख्य सिद्धांत कौनसा है? क्या है? तब - तब मुझे अक्सर एक जवाब प्रायः सुनने में आया, ‘अहिंसा परमो धर्म:!' या फिर दूसरा जवाब ये सुनने में आया कि, ‘जीओ और जीने दो।'


मुझे आश्चर्य इस बात का था कि, कई सालों से प्रवचन सुनने वालों में भी अज्ञानता किस हद तक छायी हुई है। रटा-रटाया उधार उत्तर देकर वे लोग अपने आप ही किस प्रकार संतुष्टि की साँस ले रहे थे, वो मैंने अपनी आँखों से देखा है। दोनों जवाब सुनकर जब मैं सामने प्रतिप्रश्न करता कि, ये जो आपने कहा, वो सिद्धांत कौनसे आगमों में लिखा है? मुख्य सिद्धांत के रूप में बताया गया सिद्धांत किस आधार पर मुख्य मानना चाहिए?


फिर मैं उन्हें प्रश्न करता था कि मान लो कि अहिंसा परम धर्म है, तो क्या सत्य परम धर्म नहीं है? एक बार आपकी बात मान ले कि अहिंसा सर्वोपरि है, तो क्या ब्रह्मचर्य सर्वोपरि नहीं है?


गांधीजी को ही किसी ने पूछ लिया था, आप अहिंसा को इतना महत्त्व दे रहे हो, तो बताओ कि एक आदमी झूठ के साथ अहिंसा का पालन कर रहा है और दूसरे के पास हिंसा के साथ सत्य है, तो ज्यादा आगे किसे माना जायेगा? तो उस वक्त गांधीजी का भी स्पष्ट उत्तर था कि सच का पलड़ा अहिंसा के पलडे से भारी हो जाता है, क्योंकि अहिंसा को पालने वाला यदि झूठ बोल रहा है तो उसकी अहिंसा के पालन पर भी भरोसा कौन करेगा? फिर तो उसकी अहिंसा भी हिंसा ही मानी जायेगी।


जब मैं सभा में इस सत्य को उजागर करता हूँ, तो लोग मौनव्रत धारण कर लेते हैं। फिर मैं बताता हूँ कि सिर्फ जैन दर्शन में ही नहीं, बौद्धदर्शन, न्यायदर्शन, सांख्यदर्शन इत्यादि में भी अहिंसा - सत्य - अचौर्य - ब्रह्मचर्य - अपरिग्रह बताये गये है।


अहिंसा जिस प्रकार धर्म है, ठीक उसी प्रकार सत्य एवं ब्रह्मचर्य भी धर्म है, लेकिन जब मुख्य सिद्धांत कीं चर्चा हो तब ऐसा कोई यूनिक सिद्धांत बताना पड़ेगा कि, जो और कहीं पर ना हो, और सिर्फ जैन धर्म में ही प्राप्त हो।


दूसरी बात ये भी है कि, आप जो ‘अहिंसा परमो धर्मः!’ का सूत्र उत्तर में बताते हो वह तो भगवद् गीता में लिखा गया ही  श्लोक है। आधे श्लोक का भी आधा है जिस के बाकी के आधे हिस्से में साफ-साफ बताया गया है कि, धर्म की रक्षा के लिए की गई हिंसा भी परम धर्म है।


सिर्फ़ अहिंसा ही परम धर्म नहीं, हिंसा भी परम धर्म है, यह बात भगवद् गीता की है, हमारे जैन दर्शन की नहीं है। हमारे जैन दर्शन के आगमों की मुख्य धारा में ये बात प्रायः देखने को नहीं मिलती है क्योंकि हम हिंसा को पाप और अहिंसा को धर्म मानते है, दोनों को धर्म नहीं मानते है। यह सूत्र 'अहिंसा परमो धर्म!' का सूत्र हमारे आगमों में देखने को नहीं मिलने पर भी जो प्रसिद्धि मिली है, उसका कारण मुझे ऐसा लग रहा है कि, प्रायः गाँधीजी के द्वारा इस सूत्र का प्रचार बहुत ही ज्यादा हुआ और फिर हमारे जैन धर्म के कुछ लोगों ने इसे अपना मानकर अपना लिया।


ठीक वैसे ही 'जीओ और जीने दो’ के सूत्र के साथ हुआ है। इस सूत्र का मूल भी जैनशासन के किसी भी शास्त्रों में नहीं है। ये सूत्र तो बाईबल (क्रीश्चन धर्मग्रंथ) का सूत्र ‘Live and let live’ इस सूत्र का हिंदी अनुवाद हमने सीधा ही उठा लिया, और उधार सूत्र को अपना सिक्का लगाकर प्रचारित करना शुरु कर दिया। नकल में भी अकल लगानी चाहिए, ये सूत्र की नकल करने में हमने ये कभी सोचा ही नहीं कि, इस सूत्र का आख़िर अर्थ क्या होता है?


कोई इन्सान परेशान होकर कभी किसी धर्मशाला में दूसरे यात्रियों को उपदेश देता है कि, 'सो जाओ, और सोने दो।’ 


आप जो बातें कर रहे हो उससे हमारी भी नींद बिगड़ रही है। आप को हाथ जोड़कर नम्र निवेदन है कि आप ‘सो जाओ और हमें सोने दो।’ ऐसी मजबूरी वाली बात यहाँ पर दिख रही है कि आप 'जीओ और हमें जीने दो' या फिर पोजीटीव अर्थ निकालना हो तो आप आत्महत्या मत कीजिए और दूसरों की हत्या भी मत कीजिए। ऐसा अर्थ भी निकाल सकते है। लेकिन परमात्मा महावीर के मुख्य सिद्धांत का लेबल दूसरे धर्म के सिद्धांत पर चढा देना और अपने नाम से प्रचारित करना कितना उचित है? क्या आपको ऐसा नहीं लग रहा कि हम उधार एवं अन्यों का लेने में माहिर हो गये है?


अपने भक्ति गीतों (भजनों) को भी जरा गौर से सुनेंगे तो लगेगा कि सभी भजनों की ट्यून तकरीबन फील्मी गीतों की तर्ज पर ही चलती है और हद तो तब हो गई जब अंतरिक्ष पार्श्वनाथ के दरबार में हिन्दी फील्मों के गीत की सिर्फ ट्यून ही नहीं। पूरे के पूरे शब्द (लीरीक्स) भी वैसे के वैसे ही ले लिये गये। बोलिवूड पिक्चर्स के गीतों का संगीत और सूर लेने से भी आखिर पुष्टि तो उन लोगों की ही होती है, जो समाज में गंदकी फैला चुके है, लेकिन वो ही के वो ही शब्दों को भी ले लेने से गानेवाले लोग उन चलचित्रों के चित्र एवं चरित्र में चले जाते है, जो कतई उचित नहीं है। पिक्चर्स के गीत हमारे मंदिरों में आने से उन दृश्यों की ग़लत एवं गंदी कल्पना में जाने का एक रास्ता खुलता है, जो मेरी दृष्टि में बिल्कुल अनुचित हैं।


दिक्कत वहाँ पर होती है, जब ऐसे गीतों में साधु-साध्वीजी भी सम्मिलित हो जाते है। हकीकत में उस घटना में संगीतकार - गायक कलाकार को पता था कि ये गीत दो लवरों के बीच का है, और पिक्चर का है, गाने वाली लड़कियों को भी पता था, लेकिन वहाँ पर उपस्थित साध्वीजी महाराज को बिल्कुल भी पता नहीं था क्योंकि उन्होंने पिक्चर ना देखा था, ना इस पिक्चर का गीत कभी सुना था। वो तो भोले होते है इसलिए उन्हें पता नहीं हो, लेकिन फिर जब कोई ऐसा गीत फिर से दोहरायेगा तो आधार महात्मा का ही लेगा, कि उन महात्मा ने कभी ओब्जेक्शन नहीं लिया, रोका नहीं था वो भी तो उस वक़्त गा रहे थे, सब के साथ में… तब किसी ने भी रोका नहीं, तो अब हमें क्यों रोक रहे हो? 


बात सिर्फ इतनी है कि, अनुकरण करने में अक्ल लगानी जरूरी है। 'मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा।' इस गीत की पंक्तियों का उपयोग करते हुए हम किसी में रहा हुआ अच्छा अपनाते है तो वो अच्छी ही बात है, लेकिन किसी का अच्छा लेते वक़्त हमारे दिमाग में और दिल में ख्याल तो होना चाहिए कि, ये उन से मिला है। यदि किसी का अच्छा ले रहे हो, तो लो, लेकिन अपना नाम लगाकर अभिमान करने जैसा नहीं है।


अहिंसा का सिद्धांत हो या जीओ और जीने दो का सिद्धांत हो, हमारे जैन दर्शन में सर्वोपरि मुख्य सिद्धांत के रूप में उसको स्थान नहीं दिया गया है। यूनिक सिद्धांत के रूप में भी वो नहीं है, ये बातें आपको को बतानी जरूरी है।


तो फिर मुख्य सिद्धांत कौन सा? 'आणाए धम्मो’ जिनाज्ञा परम धर्म: के रुप में जगह-जगह पर बताया गया है। परमात्मा ऋषभदेव से लेकर महावीर स्वामीजी तक सभी तीर्थंकरो की जिनाज्ञा सर्वोपरि मुख्य सिद्धांत माना गया है। यदि परमात्मा की आज्ञा है, तो दिखने वाली हिंसा भी अहिंसा है। यदि जिनाज्ञा नहीं है तो दिखने वाली अहिंसा भी हिंसा है।


मैं प्रवचनों में अक्सर दूसरा प्रश्न ये पूछता हूँ कि हमारे जैन धर्म का मुख्य ग्रंथ कौनसा है?


यदि किसी क्रीश्चन को अपने धर्म का मुख्य ग्रंथ का नाम बताने के लिए कहेंगे, वो एक सेकेण्ड में बता देगा ‘बाईबल।’ यदि किसी यहूदी को पूछेंगे तो वो बता देगा ‘थोरा (हिब्रू बाईबल)’ 

यदि किसी मुस्लीम को अपने मुख्य ग्रंथ का नाम पूछेंगे, तो वो तुरन्त ही बता देगा, 'कुरान।' यदि किसी शीख-पंजाबी भाई को पूछेंगे तो वो अपने धर्म के मुख्य ग्रंथ के रूप में नाम देगा ‘गुरु ग्रंथ साहिब।’


यदि किसी वैदिक धर्मी (हिंदू) को अपने ग्रंथ के बार में पूछेंगे तो वो तपाक से जवाब देगा ‘भगवद् गीता।'

यदि किसी बौद्ध धर्मी को अपने मुख्य ग्रंथ की नामावलि पूछेंगे तो जवाब में सिलेक्टेड ग्रंथ ही मिलते है। लेकिन यदि हम जैन धर्म के किसी मुख्य ग्रंथ के बारे में किसी को भी पूछते है तो जवाब अलग मिलेंगे। दिगंबर का जवाब यहाँ पर अलग हो सकता है।

स्थानक और तेरापंथ का जवाब यहाँ पर अलग हो सकता है। मैं श्वेताम्बर मूर्तिपूजक से हूँ, इसलिए मैं अपने ही संप्रदाय के श्रावक-श्राविका को जब पूछता है, तो मुझे जवाब मिलता है 'कल्पसूत्र'


फिर मैं उन से पूछता है, कि 'कल्पसूत्र' महान और महत्त्वपूर्ण क्यों है? क्या कारण है? तो जवाब मिलता है, आप जैसे महात्माओं ने ही बताया है कि, 'सहु सूत्र शिरोमणि कल्पसूत्र सुखकार' सभी सूत्रों में श्रेष्ठ - सभी शास्त्रों में सर्वापरि ‘कल्पसूत्र’ को बताया है।

फिर मैं इसका भी रहस्य बताता हूँ, कि ‘कल्पसूत्र’ को महान बतानेवाले महात्मा पाट पर से ऐसा क्यों बताते है? जब भी पर्युषणा चल रहा हो (पर्युषणा यानि जैन धर्म का मुख्य पर्व) तब सर्वाधिक लोग उपस्थित होते है। महात्मा के द्वारा कल्पसूत्र का वांचन श्रावक वर्ग में शुरु हुआ तब उसके गुण भी गाये गये। हकीकत में ज्ञान का खजाना तो सभी आगमों में भरा हुआ है। वैसे ही कल्पसूत्र में भी है, इसीलिए जब मैं पूछता है कि जैसे कल्पसूत्र सभी शास्त्रों में श्रेष्ठ है तो क्या आचारांग सूत्र - भगवतीसूत्र या ठाणांग सूत्र नहीं है? कल्पसूत्र के समान ही सभी बड़े-बड़े महापुरुषों के द्वारा रचित आगम अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं महान है, फिर ऐसी बात क्यों? क्योंकि पर्युषणा  में कल्पसूत्र पढ़ना होता है इसलिए उसके गुण गाये जाते है, दुल्हे के गीत दुल्हे की शादी में नहीं गायेंगे तो कब गायेंगे । कल्पसूत्र के अवसर पर यदि कल्पसूत्र की महिमा नहीं समझायेंगे तो कब समझायेंगे? इस हेतु से पर्युषणा में सर्वाधिक भीड़ के समय कल्पसूत्र का वर्णन सुनकर लोग कल्पसूत्र को ही मुख्य ग्रंथ मानने के लिए मजबूर हो जाते है, इसमें उनका भी कोई दोष नहीं है, लेकिन सच बताऊँ तो हमारे सभी आगम मुख्य ग्रंथ है।


दवाईया सारी की सारी अच्छी होती है लेकिन मेरे लिए सब से अच्छी दवाई वो है, जो मेरे काम की है। इस न्याय (लोजिक) से सोचे तो बाक़ी के आगम कितने भी अच्छे क्यों ना हो, यदि श्रावकों को पढ़ने की अनुमति नहीं है, और सिर्फ साधुओं के ही काम के हो तो श्रावकों के लिए वो ग्रंथ अच्छा होने पर भी सर्वोपरि नहीं माना जायेगा। मेरा प्रेक्टीकल उत्तर इस विषय में स्पष्ट है कि श्रावकों के लिए मुख्य ग्रंथ श्रावकों की दिनचर्या को स्पष्टतया बतानेवाले ‘श्राद्धविधि’ इत्यादि है। ग्रंथ सारे के सारे अच्छे, लेकिन श्रावकों के लिए जीवन उपयोगी यानी काम के ग्रंथ जो है वो उन्हें पढ़ने चाहिए।


अपने यहाँ परम्परा के नाम से बहुत कुछ चलता है, लेकिन जब परिवर्तन करने को कहा जाये तो डायजेशन पावर बहुत ही लिमिटेड लोगों में ही है या फिर नहीं है। अपनी प्रोब्लम ये है कि नुकसान करने वालों की नकल करने में हम अक्ल नहीं लगाते है और जो वास्तव में फायदा पहुँचाने वाला हो, जहाँ पर हकीकत में परिवर्तन करना जरूरी हो, उसे अपनाने में हम बहुत ही देर कर देते है, वहाँ पर हम चर्चा में से ही बाहर नहीं आ पाते। में ऐसा क्यों कह रहा हूँ? आप आगे पढ़ें,


क्रीश्चन धर्मावलंबियों ने अपनी स्कूलों के साथ-साथ चर्च खड़े कर दिये, कमाई भी हुई, कन्वर्जन भी घड़ल्ले से हुआ, दोनों हाथों में लड्डु मिले। इस मोडेल का अनुकरण सभी धर्मो के अनुयायियों ने करना शुरू किया। स्वामीनारायण संप्रदाय ने भी फिर जगह-जगह अपनी स्कूल एवं संस्थान खड़े किये। RSS ने जगह-जगह आदर्श विद्या मंदिर खोलकर संस्कृति की रक्षा करनी चाही। 


मुस्लिम लोग तो पहले से ही मदरेसा खोलकर बैठे थे। हर एक धर्म-संस्कृति के लोगों ने अपनी संतति (बेटे-बेटियों) एवं संपत्ति को सुरक्षित करने हेतु कमर कस ली, लेकिन जैन धर्मावलंबियों की इस बारे में घोर उपेक्षा थी, उन लोगों ने चर्च खड़े किए, हम चर्चा करके खड़े हो जाते है। हम स्कूल बना भी ले तो हमारे सिलेबस वहाँ पर पढ़ाया जायेगा या नहीं, यह प्रश्न तो खड़ा ही है। अपन माइनोरिटी में है इसलिए मिक्स कम्यूनीटी में हमारे बच्चों को पढ़ाना ही हमारी मजबूरी है। बाबा रामदेव वे जगह-जगह गुरुकूल खोले, अपना सिलेबस भी पढ़ाना शुरू कर दिया, तब अपनी आदि एकेडमी अभी पालने में से नीचे उतरकर अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश कर रही है। आदि एकेडमी और तपोवन डे स्कूल, तपोवन कन्या गुरुकुल मुंबई - गुजरात में शुरू हो चुके है, अच्छी बात ये है कि अच्छी शुरुआत तो आख़िर हुई!!!


(क्रमशः) 

Comments


Languages:
Latest Posts
Categories
bottom of page