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Join date: Apr 24, 2024

Posts (13)

Sep 22, 2026 ∙ 2 min
द्रव्य - व्यवस्था
दान के रूपमें प्राप्त (या धार्मिक सम्पत्तियों से आय रूप में प्राप्त) धार्मिक संपत्ति की व्यवस्था किस प्रकार करनी चाहिए ? इसकी एक सुदृढ़ व्यवस्था जिनशासन में है, जो अन्य किसी भी दर्शन में देखने को नहीं मिलती। अन्य दर्शनों में मंदिरों में आने वाली दान-पेटियों की आय के मालिक, मंदिर के मालिक या पुजारी बन जाते हैं... और मंदिर को अपने जीवन-निर्वाह (या ऐशो-आराम) का साधन बना देते हैं। लेकिन जिनशासन में एक अटूट सिद्धांत है – जिस कार्य के लिए दान प्राप्त हुआ हो, उसी (या वैसे ही) कार्य में ही उसका उपयोग...

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Aug 6, 2026 ∙ 2 min
प्रायश्चित्त की व्यवस्था
परमात्मा के शासन की एक कम प्रसिद्ध लेकिन अद्भुत विशेषता है प्रायश्चित्त की व्यवस्था। पापों के प्रायश्चित्त को बताने वाले विशेष (Special) ग्रंथ जिनशासन में उपलब्ध हैं, जो हज़ारों श्लोकों के प्रमाण में हैं। उनमें वर्णित कुछ खास विशेषताओं को संक्षेप में देखते हैं ➡ पाप करने के कारण के आधार पर प्रायश्चित्त का भेद पाप किन कारणों से होता है – यह जिनशासन में विस्तृत रूप से बताया है। मुख्यतः पाँच कारण बताए गए हैं अनाभोग (अज्ञान), सहसात्कार (अचानक हो जाना), प्रमाद (आलस्य, सुखप्रियता आदि), दर्प...

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Jul 8, 2026 ∙ 2 min
अविरति से पापबंध
जिनशासन की एक अनुपम विशेषता है वह केवल पाप-प्रवृत्ति को ही नहीं, बल्कि पाप की अविरति को भी पाप मानता है, कर्मबंध का कारण मानता है। इस बात को विस्तार से समझते हैं। मान लो कि आप आज तक विदेश नहीं गए हो, और भविष्य में जाने की कोई योजना अभी नहीं है। मैं आपसे कहूं – “जीवन में कभी विदेश न जाना” ऐसी प्रतिज्ञा ले लो। क्या आप यह प्रतिज्ञा लोगे ? अधिकतर लोगों का उत्तर होगा – "नहीं"। क्यों ? यदि विदेश जाने की अभी कोई योजना है ही नहीं, तो भी प्रतिज्ञा लेने की तैयारी क्यों नहीं होती ? क्योंकि मन में यह...

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