उत्सर्ग-अपवाद
- Pujya Panyas Shri Bhavyasundar Vijayji Maharaj

- Jun 3
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जिनशासन की अप्रतिम विशेषताओं में से एक है - जिनशासन में मार्ग के दो प्रकार बताए गए हैं – उत्सर्ग और अपवाद।
कोई विशेष कारण न हो, तब जिसका आचरण करना है, उसे उत्सर्ग कहते हैं।
विशेष कारण आने पर जिसका आचरण करना है, उसे अपवाद कहते हैं।
उदाहरणों से यह विषय स्पष्ट होगा।
साधु-साध्वी भगवंतों के आचरण में उत्सर्ग-अपवाद को समझते हैं -
1.रोज एकासणा करना – एक ही बार गोचरी वापरना, वह उत्सर्ग है।
बीमारी हो, वृद्धावस्था हो, विहार-प्रवचन-पठन आदि का कठोर परिश्रम हो, तपस्या का पारणा हो, शरीर कोमल होना आदि कारणों से असहिष्णुता हो... एकसणा करने से स्वाध्याय, वैयावच्च आदि ज्यादा महत्त्वपूर्ण आराधनाओं को हानि पहुँचती हो, दुर्ध्यान होता हो... तो दो-तीन (या अधिक) बार गोचरी वापरना, वह अपवाद है।
2.नंगे पाँव विहार करना - वह उत्सर्ग है।
यदि रास्ता कंकड़ वाला हो, जिससे पैर छिल जाते हों और चलना असंभव हो जाता हो, प्रकृति की विषमता के कारण पैरों में फोड़े पड़ जाते हों और चलना कठिन हो जाता हो, डामर पर चलने से आँखों को नुकसान होता हो, नंगे पाँव रास्ते के किनारे चलना असंभव होने के कारण बीचमें चलने पर दुर्घटना की संभावना हो... तो ऐसे सभी कारणों से पैरों में मोज़े पहनकर चलना - वह अपवाद है।
3.दिन के तीसरे प्रहर (12:30 से 4:00 बजे) में ही विहार करना उत्सर्ग है। धूप के कारण पित्तजन्य रोग उत्पन्न होता हो, गोचरी वापरने के बाद चलना कठिन हो... तो सुबह विहार करना - वह अपवाद है।
4.गृहस्थों ने उनके लिए ही बनाया हुआ आहार वहोरना — वह उत्सर्ग है। बीमारी में पथ्य आहार उस प्रकार न मिल पाता हो, विहार में जैनों या उच्च वर्ण के घर न होने के कारण वैसा आहार न मिल पाता हो, घरों में वहोरने के लिए जाया न जा सके ऐसी वर्षा (या लॉकडाउन !) हो... आदि कारणों से साधु के लिए बनाया गया आहार वहोरना — वह अपवाद है।
5.बिजली से चलने वाले उपकरणों का उपयोग न करना – न करवाना, यह उत्सर्ग है।
6.मकान में घना अंधेरा होने के कारण, कमजोर दृष्टि वाले वृद्ध कहीं टकरा जाएँ – गिर जाएँ, ऐसी संभावना हो, तो गृहस्थों का ध्यान खींचकर प्रकाश की व्यवस्था करवाना... अचानक साधु बीमार पड़ जाएँ, तो वैद्य/डॉक्टर को बुलवाने के लिए गृहस्थों द्वारा संदेश भिजवाना... इन सब में बिजली से चलने वाले उपकरणों का उपयोग करवाना - यह अपवाद है।
श्रावकों के आचारमें उत्सर्ग–अपवाद देखते हैं -
1.मध्याह्न काल में जिनपूजा करना, वह उत्सर्ग है। नौकरी-धंधा, स्कूल आदि कारणों से सुबह जल्दी जिनपूजा करना... तीर्थ में शाम को पहुँचने से शाम को जिनपूजा करना... आदि अपवाद हैं।
2.गोदोहिका आसन (उभड़के पैर) में व्याख्यान सुनना - वह उत्सर्ग है।
एक घंटे उस प्रकार बैठने का शारीरिक सामर्थ्य न होने के कारण या ऐसी आदत न होने के कारण बैठा न जा सके, तो पलाठी मोड़कर बैठकर सुनना... घुटने या कमर की तकलीफ होने के कारण नीचे बैठा न जा सके, तो पाटली या कुर्सी पर बैठकर सुनना - वह अपवाद है।
3.प्रतिक्रमण आदि सभी क्रियाएँ खड़े-खड़े ही करनी - यह उत्सर्ग है।
बुढ़ापा, बीमारी, तप आदि कारणों से ऐसा शारीरिक सामर्थ्य न हो, तो बैठकर (यहाँ तक कि लेटे-लेटे भी) क्रिया करनी - यह अपवाद है।
4.छ री का पालन करते हुए तीर्थयात्रा करना - वह उत्सर्ग है।
ऐसी समय की अनुकूलता या शारीरिक सामर्थ्य आदि न होने के कारण वाहन का उपयोग करके तीर्थयात्रा करना - वह अपवाद है।
5.सूर्यास्त के समय वंदित्तु आए, उस प्रकार देवसि प्रतिक्रमण करना - वह उत्सर्ग है। नौकरी-धंधा, स्कूल, गृहकार्य आदि कारणों से अपनी ऐसी अनुकूलता न हो... गुरुभगवंत की निश्रा में/संघ में सामूहिक प्रतिक्रमण देर से ही होता हो, तो देर से प्रतिक्रमण करना... यात्रा पर निकलना हो इसलिए दोपहर 3–4 बजे जल्दी प्रतिक्रमण करना - वह अपवाद है।
इस प्रकार के और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। पदार्थ को समझने के लिए इतने उदाहरण ही पर्याप्त हैं।
आपने देखा होगा कि उत्सर्ग में जो करना होता है, में उसका बिलकुल उल्टा अपवाद में करना होता है ! फिर भी, दोनों ही मार्ग हैं ! दोनों ही मोक्षरूप मंज़िल तक पहुँचाने वाले बनते हैं, और शाश्वत सुख की प्राप्ति कराते हैं !
ऐसा जिनशासन मानता है, कहता है, आचरण करता है !
है ना जैन धर्म (जिनशासन) की यह अद्भुत विशेषता ! Complete Flexibility, No Rigidity… कहीं जड़ता नहीं, परिस्थिति के अनुसार मार्ग बदलने की पूरी तैयारी !
शास्त्रों में यह बात बहुत सुंदर उदाहरण से समझाई गई है...
अगर किसी को पित्त का बुखार हो, तो घी और शक्कर खिलाने से वह शांत हो जाता है — उसके लिए घी-शक्कर ही औषधि है।
यदि किसी को कफ का बुखार हो, तो घी-शक्कर देने से वह बढ़ जाता है। उसके लिए यह अपथ्य (हानिकारक) है। उसके लिए सोंठ, मरीच (काली मिर्च) आदि औषधि है।
अर्थात्, रोग के अनुसार और व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार औषधि बदलती है। आयुर्वेद में तो रोग कितना पुराना है ? इसके आधार पर भी औषधि बदलती है।
महत्त्व उसका है कि रोग का नाश होना चाहिए।
जो जिसके जिस रोग का नाश करे, वही उसके उस रोग के लिए औषधि है।
‘घी’ ही हमेशा औषधि है या सोंठ ही औषधि है — ऐसा कोई निश्चित नियम नहीं है।
उसी प्रकार, जिस मार्ग पर चलने से व्यक्ति के राग-द्वेष आदि दोष घटें या नष्ट हों — वही उसके लिए 'मार्ग' है। दो व्यक्तियों के लिए मार्ग भिन्न हो सकते हैं, दिखने में बिल्कुल विरोधी भी हो सकते हैं।
यहाँ तक कि एक ही व्यक्ति के लिए अलग-अलग समय पर, अलग-अलग परिस्थितियों में भी मार्ग अलग हो सकते हैं।
ऐसा लचीलापन (Flexibility) दुनिया के किसी भी धर्म में नहीं है — केवल और केवल जिनशासन में है।
अहो ! जिनशासनम् !
उत्सर्ग–अपवाद के बारे में थोड़ा जान लेते हैं।
1.किसके लिए कौन-सा मार्ग सही/उचित है ? इसका निर्णय ज्ञानी (गीतार्थ) गुरु भगवंत ही कर सकते हैं। शास्त्रों के अध्ययन और अनुभव के आधार पर उनमें ऐसा सामर्थ्य होता है।
अज्ञानी यदि ऐसा निर्णय करने जाए, तो वो ठोकर खा सकता है – उल्टे मार्ग को ही सही मार्ग समझ बैठे, और मार्ग से भटक जाए... ऐसी पूरी संभावना रहती है।
2.जब कोई विशेष कारण होता है, तब जो ‘अपवाद’ रूप मार्ग बनता है, वही मार्ग, यदि उस कारण के बिना ही आरामप्रियता, प्रमाद (लापरवाही) या राग-द्वेष से आचरण में लाया जाए, तो वह उन्मार्ग (गलत मार्ग) बन जाता है, अनाचार हो जाता है।
अर्थात्, अपवाद और उन्मार्ग का बाहरी स्वरूप एक जैसा होता है,
परंतु यदि कारण उचित हो, तो वह अपवाद कहलाता है,
और कारण अनुचित हो, तो वह उन्मार्ग कहलाता है।
उदाहरण के रूप में -
शारीरिक सामर्थ्य न होने के कारण बैठकर क्रिया करना, यह अपवाद है।
लेकिन आलस्य के कारण बैठकर क्रिया करना — यह उन्मार्ग और अतिचार है।
3.अपवाद के अनेक प्रकार हो सकते हैं। किस परिस्थिति (संयोग) में कौन-सा अपवाद अपनाना चाहिए, इसका निर्णय करने का अधिकार भी ज्ञानी पुरुष को ही होता है।
उदाहरण के रूप में -
यदि एकासणा नहीं किया जा सके, तो बेसणा करना चाहिए ?
या फिर नवकारशी ? इसका निर्णय ज्ञानी ही करते हैं।
4.जितनी निर्जरा उत्सर्ग के आचरण से होती है, उतनी ही निर्जरा उचित कारण से किए गए अपवाद के आचरण से भी हो सकती है। अपवाद का आचरण करते हुए ही वीतरागता और केवलज्ञान प्राप्त हुआ हो ऐसे कईं उदाहरण शास्त्रों में मिलते हैं — जैसे कि नदी पार करते समय अर्णिकापुत्र आचार्य को केवलज्ञान हुआ।
इसलिए, यह सोचना कि "उत्सर्ग" ऊँचा मार्ग है और "अपवाद" नीचा मार्ग है - यह सही नहीं है। दोनों का सामर्थ्य समान है।
5.जब अपवाद आचरने का कारण आया हो, तब भी यदि कोइ उत्सर्ग मार्ग को पकड़ रखे, तो वह विराधक हो सकता है, ऐसी संभावना है। इसलिए उसका भी प्रायश्चित आता है।
इस विषय को थोड़ा विस्तार से समझते हैं।
अपवाद करने के कारणों को मोटे तौर पर दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।
A.अपना शारीरिक सामर्थ्य, प्रतिकूल परिस्थितियाँ आदि । जैसे कि एकासन करने की शक्ति न होना। ऐसी परिस्थितियों में यदि उत्सर्ग को पकड़े रखा जाए, तो
i.यदि जीव में सत्त्व हो, तो वह आराधक बनता है। जैसे कि स्थूलिभद्रजी के भाई श्रीयक मुनि ने शक्ति से अधिक तप किया, फिर भी आराधक बने।
ii.यदि सत्त्व न हो, तो दुर्ध्यान से विराधक भी बनता है।
B.शासन के कार्य आ जाएं, वह भी अपवाद का कारण है। ऐसे अवसरों पर यदि कोई उत्सर्ग को पकड रखता है, वह जड़ता कहा जाता है, वह विराधक ही होता है।
जैसे यदि साधु को दुर्घटना के कारण वाहन से शहर ले जाना आवश्यक हो जाए, तब यदि कोई अन्य व्यक्ति यह उत्सर्ग को पकड रखे कि ‘साधु को वाहन का उपयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए’, तो वह विराधक होता है, और साधु के कालधर्म का भी कारण बन सकता है।
सारांश
1.सामान्य परिस्थितियों में उत्सर्ग मार्ग अपनाना चाहिए।
2.यदि परिस्थिति प्रतिकूल हो जाए, तो सत्त्व बढ़ाकर भी उत्सर्ग मार्ग को पकड़ रखने का प्रयास करना चाहिए।
यदि वह असंभव हो जाए, तो गीातार्थ गुरु भगवंत का मार्गदर्शन लेकर अपवाद अपनाना चाहिए। (स्वयं निर्णय नहीं लेना चाहिए।)
3.शासन के कार्य के लिए अपवाद अपनाना पड़े, तो उसे मार्ग समझकर अपनाना चाहिए, हिचकिचाना नहीं चाहिए, जड़ बनकर उत्सर्ग का आग्रह नहीं रखना चाहिए।
4.उचित कारण से अपवाद करने वाले को न उन्मार्गी मानना चाहिए, न नीचा। उनकी निंदा कभी नहीं करनी चाहिए।
5.“ऐसा ही करना चाहिए” या “ऐसा कभी नहीं करना चाहिए” – ऐसा एकान्त नहीं पकडना चाहिए। ऐसा एकान्तवाद मिथ्यात्व है। शास्त्रकारों का कथन है – ब्रह्मचर्य को छोड़कर बाकी सभी आराधनाओं में उत्सर्ग और अपवाद हैं।
ब्रह्मचर्यपालन में अपवाद नहीं है, क्योंकि अब्रह्म-सेवन से आत्मा के दोष बढ़ते ही हैं, घटते नहीं।













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