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अविरति से पापबंध


  • जिनशासन की एक अनुपम विशेषता है वह केवल पाप-प्रवृत्ति को ही नहीं, बल्कि पाप की अविरति को भी पाप मानता है, कर्मबंध का कारण मानता है।


इस बात को विस्तार से समझते हैं। 


  • मान लो कि आप आज तक विदेश नहीं गए हो, और भविष्य में जाने की कोई योजना अभी नहीं है।

मैं आपसे कहूं – “जीवन में कभी विदेश न जाना” ऐसी प्रतिज्ञा ले लो। क्या आप यह प्रतिज्ञा लोगे ?

अधिकतर लोगों का उत्तर होगा – "नहीं"।


क्यों ? यदि विदेश जाने की अभी कोई योजना है ही नहीं, तो भी प्रतिज्ञा लेने की तैयारी क्यों नहीं होती ?

क्योंकि मन में यह प्रश्न उठता है – “अगर कभी जाने का अवसर आ गया तो?”

और अगर ऐसा अवसर आता है, तो जाने की मानसिकता कहीं न कहीं भीतर बैठी हुई है। और यह मानसिकता – अवसर आने पर पाप करने की तैयारी रूपी इच्छा भी पाप है – ऐसा जिनशासन कहता है।

हमारी मानसिकता को गहराई से खंगाल कर हमारे दोषों को दिखाने का परम उपकार इस जिनशासन ने किया है।

अहो ! जिनशासनम् !

और इसी कारण


  • जीवों को मारने की इच्छा से मारना – यह तो पाप है ही,

लेकिन मारने की प्रकट इच्छा न होते हुए भी, देखे बिना चलना – यह भी पाप है; क्योंकि “किसी भी जीव की मुझसे हिंसा न हो” – ऐसी परिणति (भीतर की भावना) नहीं है। (अगर वह परिणति हो, तो व्यक्ति देखकर ही चलेगा।


  • साधु दोषित आहार को ग्रहण करे – यह तो पाप है ही, लेकिन ‘आहार दोषित है या निर्दोष?’ यह जांचे बिना ग्रहण करे – तो वह भी पाप है; क्योंकि “मुझे दोषित आहार बिल्कुल नहीं लेना है” – ऐसा पक्का संकल्प (अध्यवसाय) नहीं है।

(यदि ऐसा संकल्प हो, तो ‘दोषित नहीं है’ यह सुनिश्चित करके ही आहार लेगा।)

ऐसे कई उदाहरण सोचे जा सकते हैं। 


  • जिनशासन अविरति को पाप बताकर हमें प्रतिज्ञाबद्ध होने के लिए प्रेरित करता है। जब हम प्रतिज्ञा लेते हैं, तब पाप करने की तैयारी रूपी (भीतर छिपी हुई) इच्छा भी नष्ट हो जाती है।

फिर अगर कोई प्रलोभन (लालच) भी दे, तो भी पाप नहीं होता।

इसलिए विरति (व्रत), भविष्य में संभावित पाप-प्रवृत्ति से भी बचाती है। 


  • हमें प्रभु का शासन प्राप्त हुआ, उसकी सफलता प्रभुशासन की अद्भुत विशेषता स्वरूप विरति को अधिकाधिक अपनाने में ही है।

तो आइए, अगर सर्वविरति नहीं ले सकते, तो भी देशविरति तो लेनी ही है – ऐसा संकल्प करें।

(देशविरति का अर्थ है: श्रावक के बारह व्रतों में से अपनी शक्ति अनुसार व्रत लेना। कोई भी व्यक्ति, बारह में से आठ व्रत सामान्यतः ले सकता है।)


अधिक जानकारी के लिए देखें पुस्तक – बारह व्रत।


1 Comment


Guest
2 days ago

REALY APPRECIATING AS YOU ARE GIVING TRUE ESSENCE OF JAINISM. ANUMODANA🙏

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