जैनत्व वेदना… जैनत्व संवेदना… Part 3
- Panyas Shri Nirmohsundar Vijayji Maharaj Saheb

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अभी कुछ महिनों से युद्धविभिषिका समस्त विश्व को डरा रही है। मीडिया और मन दोनों युद्ध के समाचारों से भरे जा रहे हैं, डरे जा रहे है।
हम उन दिनों में अंतरिक्षजी तीर्थ में थे, जब इरान-अमरिक के युद्ध को एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था। एक डॉक्टर मेरी सलाह लेने के लिए अंतरिक्षजी आये थे, मैंने बात-बात में उन्हें कहा था कि अब तैयारी कर लो, वर्क फ्रोम होम के दिन वापिस आनेवाले है।
मार्च - 21 को कहीं बात को एक महिना मुश्किल से हुआ होगा, और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई ने भी अपने उद्बोधन (भाषण) में बोलना शुरू कर दिया कि, कोविड जैसी हालत फिर से बनने जा रही है। वर्क फ्रोम होम के दिन आ रहे हैं।
पता नहीं क्यों, इन्सान को सोना बहुत पसंद है, चाहे वो बिस्किट का हो या बिस्तर का…
सुविधाप्रेमी मन, संघर्ष से दूर भागता है। सज्जन इन्सान को युद्ध बिल्कुल भी पसंद नहीं है, लेकिन समझदार सज्जन वो है, जो युद्ध आने से पहले ही आनेवाले युद्ध को पहचान कर तैयारी कर ले। सोनेवाला मरता है, जागनेवाला बचता है।
हम युद्ध को चाहे या ना चाहे, जिंदगी में कहीं पर भी, कभी ना कभी संघर्ष का सामना सभी को करना ही पड़ता है। इरान नहीं चाहता था तो भी अमरिका- इज़रायल ने उसे युद्ध के मैदान में आखिर घसीट ही लिया। युद्ध भले ही दो देशों के बीच लड़ा जाना हो, लेकिन उसकी लम्बी-चौड़ी असर आज के सोशल-प्रीन्ट-इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े पूरे विश्व का भोगनी पड़ती है। अभी के युग में विश्व के सभी देश आर्थिक कहो या सांस्कृतिक कहो, एक दूसरों से जुड़े हुए है।
मुझे आज जिनशासन की बात करनी है। हमारा जिनशासन भी आज बाहरी और भीतरी अनेक षड्यंत्रों के साथ अनेक आक्रमणों का शिकार हो रहा है। आप भले ही निर्दोष हो, बेगुनाह हो, और किसी का बूरा करने का स्वप्न में भी सोच नहीं रहे हो, फिर भी आपके साथ कोई बूरा नहीं करेगा। ऐसा कहना मुश्किल है। प्रभु महावीर को किसी के भी साथ दुश्मनी नहीं थी, लेकिन महावीर के भी अनेक दुश्मन थे। भगवान जैसे भगवान को भी दुष्टों ने नहीं छोड़ा है, तो हम किस खेत के टमाटर ???
एक महातपस्वी आचार्य भगवंत कुछ साल पहले हो गये। एक जिनालय (मंदिर) की प्रतिष्ठा उनके हाथों से ही करवाने की विनंती पदाधिकारियों के द्वारा हुई, और वह शुभमंगल दिन भी आ गया, जिसका इंतजार था।
सैंकड़ों की संख्या में अट्ठाई का तप कर चुके उस प्रभावक आचार्य भगवंत के साथ एक खतरनाक घटना घटित हुई, (प्रतिष्ठा के दिन पर ही..) आचार्य महाराज का आसन आचार्य श्री के उत्तर साधक के रूप में रहे विधिकारक भाई ने उस प्रतिमा के सामने बिछाया था, जिस प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा करनी थी। आचार्य महाराज बैठ भी चुके थे, लेकिन कुछ मिनटों में ही आचार्य श्री ने अपने आत्मीय प्यारे विधिकारक भाई को नजदीक आने के लिए कहा। विधिकारक भाई पूर्ण समर्पित एवं समझदार थे। जब वो भाई गुरुदेव के करीब आये तो गुरुदेव ने उसे अपने आसन पर नजर करने को कहा। विधिकारक भाई चौंक गये, क्योंकि जब उन्होंने आसन बिछाया था, तब उस आसन पर कुछ भी नहीं था, और अभी आचार्य श्री के आसन पर चारों ओर काले काले उड़द के दाने आ चुके थे। चौंकते हुए विधिकारक भाई ने पूछा, 'ये कहाँ से आ गये?’ मैंने जब आसन बिछाया था, तब तो कुछ भी नहीं था।
पूज्य श्री ने स्मित के साथ प्रत्युत्तर दिया कि, 'ये दाने कोई सहज, सादे दाने नहीं है, ये उड़द के दाने ऐसे ही नहीं आ गये, उसे किसी के द्वारा भेजे गये है।'
विधिकारक ने पूछा, 'किसने भेजा है? इस से आप को तो कोई नुकसान नहीं होगा ना?'
प्रश्न सुनकर आचार्य श्री ने उत्तर दिया, 'कहाँ से आये है, वह जाँच का विषय है, लेकिन इतना तय है की ये दाने मारण क्रिया में प्रयुक्त हुए है और मारण प्रयोग स्ट्रांग होने से मेरी मौत भी हो सकती है।’
विधिकारक भाई शिष्य जैसे थे, इसलिए रुआंसे स्वर में बोले कि, 'इस का कोई रास्ता हो तो बताईये, जो कुछ भी हो मैं निवारण के लिए तैयार हूँ।'
आचार्य श्री बोले, 'प्रयोग हटाने के लिए उपाय तो है, लेकिन छप्पन ईन्च का सीना चाहिए। कर पायेंगे?’
विधिकारक भाई बोले, 'मौत भी मंजूर है, यदि आप सुरक्षित हो जाते है तो... आप तो बेझिझक बताइये।
तब आचार्य श्री बोले कि, ‘ये सारे के सारे दाने ले जाकर इस तीर्थ की धर्मशाला की टेरेस में जाकर, मैं जो अभी मंत्र बता रहा हूँ, वो मंत्र गिनकर आसमान की ओर उछालना, जब तू उड़द के दाने ऊपर आसमान में उछालेगा तब ऊपर से एक भी दाना नीचे नहीं आयेगा, लेकिन तुझे इस साल हार्ट अटैक आयेगा, मगर डरना मत तू बच जाएगा। (आचार्य श्री भले ही नहीं बोले, लेकिन ऐसा समझना है कि, मैं तुझे मरने नहीं दूंगा, बचा लूंगा...')
विधिकारक ने सारे के सारे दाने लेकर आचार्य श्री ने बताई हुई विधि पूरी की, और विधिकारक को फिर से आश्चर्य का झटका लगा, क्योंकि आचार्य श्री की बात सम्पूर्ण रूप से सच हुई थी, एक भी उड़द का दाना जमीन पर नहीं आया। ऐसा विरल दृश्य विधिकारक ने आज तक अपनी जिंदगी में देखा नहीं था।
इस सत्यघटना को मुझे सुनाते हुए स्वयं विधिकारक भाई ने आगे बताया कि, 'साहेबजी! उसी साल मुझे हार्ट अटॅक आया और मैं मरा नहीं ये तो आश्चर्य की बात है ही, लेकिन अभी स्टोरी का क्लाईमेक्स आना बाकी है।'
मैं भी उनकी बातें दिल थामकर सुन रहा था। विधिकारक भाई बोले कि जब बाद में मैंने आचार्य श्री को कहा की, साहेबजी! कमाल हो गई, एक भी उड़द नीचे नहीं आया।
तब आचार्य श्री उदास होकर बोले कि 'यदि मुझे पहले पता चल गया होता तो यह मारण क्रिया के निवारण की क्रिया करवाने के लिए मैं तुझे नहीं कहता। जब मैंने जाँच की तो पता चला कि हमारे ही ग्रुप के उत्कृष्ट पद पर बैठे एक आचार्य महाराज ने ही मुझे खत्म करने के लिए ये कांड किया था, उनको खुद को ये प्रतिष्ठा का मौका चाहिए था, लेकिन मिला नहीं तो ईर्ष्या के पाप से ये प्रयोग करवाया। लेकिन अब तो ये प्रयोग उल्टा उनके के ऊपर ही चला गया है, और ये तंत्र प्रयोग उन्हीं का प्राण हर लेगा।
विधिकारक भाई गमगीन चहरे से मुझे बोल रहे थे कि, ‘निर्मोहसुंदर विजयजी म.सा!’ अभी तो ना मेरे गुरुदेव उपस्थित है, ना मेरे गुरुदेव पर तंत्र प्रयोग करवाने वाले वो आचार्य उपस्थित है, लेकिन ये बताने में मुझे शर्म आती है कि, मलिन क्रिया (मेल विद्या) का प्रयोग करवाने वाले पर ही प्रयोग उल्टा जाने से वो उसी साल तड़प तड़प कर मारे गये । मेरे गुरुदेव तो बाद में अनेक साधना इत्यादि करके इस धरती से विदा हुए।
मैं जब जैनत्च वेदना-संवेदना पर लिखने की सोच रहा था तब इतने सारे टोपिक्स मेरे सामने खुल रहे है कि, बात मत पूछो, और उसमें भी आक्रमण का टोपिक तो बहुत ही डेन्जरस है। मेरा तो दिमाग ही चकरा गया कि कौन से आक्रमण के बारे में बताऊँ? क्योंकि ये विषय ही ऐसा है कि, कुछ बातें खुलकर भी नहीं लिख सकते है।
अन्य धर्मवालों के खुले आक्रमण की चर्चा करूँ या
अपने ही धर्मवालों के गुप्त आक्रमण की चर्चा करूँ?
अपनी युवापीढ़ी के ऊपर एजुकेशन के रास्तों से होने वाले बौद्धिक आक्रमण की बात करूँ या
अपने अनुयायियों की आस्था की जड़े हीलाकर रखने वाले नास्तिक वादियों के आक्रमण की बात करूँ?
हमारे लोगों पर हो रहे आर्थिक आक्रमण को उजागर करूँ या
हम पर हो रहे सांस्कृतिक आक्रमण को?
स्वदेशी आक्रमण
परदेशी आक्रमण
अन्य संप्रदाय
स्वसंप्रदाय
अन्य गच्छ
या स्वगच्छ
व्यक्तिगत आक्रमण
सामूहिक आक्रमण
निष्क्रिय आक्रमण
सक्रिय आक्रमण
कितने-कितने गिनाये क्या-क्या लिखें?
सारी चर्चा छोड़कर संक्षिप्त में बताये तो आज जिनशासन में तीन की भयानक हानि दिख रही है।
आज्ञा
अहोभाव
एकता
आज जैन संघ में नायक एवं निर्णय की क्राइसीस साफ-साफ दिख रही है। एक नेतृत्व कहीं पर भी दिख नहीं रहा है।
महत्त्वपूर्ण मुद्दों की महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग चर्चा भी नहीं करते और पोलिसी पेरालीसीस जब साफ-साफ दिख रहा हो तब ऐसा गहरे मौन को गुणकारी समझना चाहिए या नुकसानकारी???
मुझे ऐसा लगा रहा है कि, ऐसी स्थिति बनने का मुख्य कारण तीन है-
विशुद्धपुण्य के स्वामी का नेतृत्व पद पर ना होना।
विशिष्ट शक्ति से संपन्न किसी का नेतृत्व पद पर नहीं होना।
विशेष ज्ञान के मालिक ऐसे अतिशय संपन्न का हमारे बीच नहीं होना।
सब से चिंताजनक बात ये है कि, वर्तमान में जिनशासन में अनेक साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका पर ब्लैक मेजिक के हमले शुरू हो चुके है। अच्छे-अच्छे महात्मा भी जब इस से पीड़ित होते दिखते है तो चिंता होना लाजमी है। पहले कभी भी हमने देखा नहीं था कि, काला धागा किसी साधु या साध्वी के पैरों में बंधा हुआ हो, लेकिन आजकल गृहस्थों के साथ-साथ संसार त्यागियों के पैरों में भी काले धागे प्रोटेक्शन के लिए बंधे हुए दिख रहे है।
काले धागे का विरोध मैं इसलिए नहीं करना चाहूंगा, क्योंकि यदि किसी को इस से साधना में सहायता हो रही है, किसी की साधना में यदि आने वाले अंतराय दूर होते है, और इस रास्ते के अलावा यदि दूसरा काई चारा ही ना हो तो काले धागे का विरोध करना मुर्खता है।
सिर्फ मेरी शिकायत गिनों तो शिकायत इतनी ही है कि, कभी-कभी हमारे जैन धर्म के अनुयायीयों को जब अपने यहाँ इस समस्या का समाधान नहीं मिलता है तब वे अन्य धर्म के लोगों के पास मजबूरन जाते है, और अन्य धर्म के लोग उनका नाजायज फायदा भी उठाते है तब मुझे लगता है कि हम इस विषय में कोई ऐसी सात्त्विक व्यक्ति या सात्त्चिक शक्तियों को जागृत क्यों नहीं कर पाये है?
तंत्र क्रिया को दूर करने हेतु जब मौलवी फकीर या ऐसे लोगों के पास जाते है तब नोनवेज खाने के लिए भी फोर्स किया जाता है, किसी-किसी का तो शोषण भी किया जाता है, तब समाधान की दिशा में सक्रिय प्रयास करना ही एक मात्र अंतिम रास्ता है।
(क्रमशः)













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