जैनत्व वेदना… जैनत्व संवेदना… Part 1
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चेन्नई से मुम्बई की ओर विहार चल रहा है। बीच में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना होते हुए महाराष्ट्र में आ चुके है।
आंध्रप्रदेश के हर गाँव के बाहर चर्चो को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। जानकारी लेने पर पता चला की, पूर्व मुख्यमंत्री जगन रेड्डी क्रीश्चन धर्म में कन्वर्ट हुआ और फिर पूरे आंध्र का कन्वर्जन करने में उसने पूरा सहयोग दिया।
मुंबई के बाहरी इलाकों में एक गाँव है, जहाँ पर अपनी एक जैन संस्था ने अनाथ बच्चों का आश्रम बनाने के लिए जब जगह लेने की कोशिश की, तो एक काला सच सामने आया।
आज भारत में अधिकांश अनाथाश्रम मिशनरीयों के द्वारा संचालित किये जा रहे हैं, क्रीश्चन मिशनरियों की प्रवृत्ति सिर्फ यहाँ तक सीमित नहीं है, स्कूलो, मेडिकल कोलेज, विविध चेरीटी संस्थाओं, सामाजिक कार्यो में संलिप्त इन लोगों के माध्यम से ये काम (कन्वर्जन का कार्य) धडल्ले से चल रहा है। किसी को पैसों के बल पर, किसी को लोजिक से, किसी को भूत-प्रेत की बाधा उतारने के नाम पर, अलग-अलग अनेक तरीकों से अपने पाले में संख्या बढाने का काम तेजी से चल रहा है। जब एक जैन संस्था अनाथ बच्चों को आश्रय देने के लिए आगे आयी तो, मिशनरीज वालों ने अवरोध डाल दिया और जगह तक नहीं लेने दी, वहाँ के पुलिस वालों ने भी यह कहकर पल्ला झाड़ दिया कि, ‘यहाँ पर तो इनका ही चलता है, आप सोच-समझकर आगे बढना’
मामले की तह में गये तो पता चला कि हमारी जैन संस्थाओं को यदि मंदिर बनाना हो, या फिर मंदिर का ट्रस्ट बनाना हो तो तुरंत ग्रीन सिग्नल मिल जाता है, क्योंकि जैन मंदिर बनाने से उनका काम आसान हो जाता है।
अपने बच्चें उनकी स्कूलों में पढ़ते हैं, वहाँ स्कूल में ही चर्च होते है, और शिक्षा में समाज कल्याण, मानवता के पाठ सीखाकर ये बताया जाता है कि, मानवसेवा ही असली प्रभुसेवा है और मानवसेवा हमारे धर्म के लोग ही ज्यादातर करते हैं। जैनमंदिर खड़े हो जाये और मंदिर में जानेवालों का दिमाग ही बदल जाये तो नुकसान कितना बड़ा होगा, क्या आपने सोचा है कभी?
मंदिर में जमा राशि से हम सिर्फ मंदिर संबंधित कार्य ही कर पाते हैं, और वह राशि भी खर्च नहीं कर पाने के कारण भविष्य में सिद्धिविनायक, शीर्डी इत्यादि मंदिरों की व्यवस्था की तरह यदि गवर्मेन्ट के हाथों में राशि चली गई तो हमारे हाथों में बचेगा क्या?
ना संतान अपनी रहेगी, ना संपत्ति अपने काम लगेगी। न्यू जनरेशन के दिमाग़ में भी यह बात आसानी से घुसाई जा सकती है कि, देखो आप के जैनधर्म में कोई भी इन्सान या इन्सानियत की जगह नहीं है, अनाथ बच्चों की सेवा हो या अस्पताल में बिमार लोगों की सेवा हो, क्रीश्चन धर्म वाले ही इस में आगे हैं।
कभी-कभी तो क्या होता है, सिर्फ़ एक बड़े अफसर या पोलिटिश्यन की जेब भारी कर देने मात्र से कई सारी जगह सस्ते में मिल जाती है, कई सारी सुविधाएँ फ्री में हो जाती है, और ऐसी नीति हम विहार में देखते आये हैं। पहाडों पर बड़ी-बड़ी जगह, जो एक जमाने में फोरेस्ट डिपार्टमेंट की थी, गवर्नमेंट के अंडर में थी, वो आज कुछ लोगों के धर्मस्थान के रुप में आवंटित हो चुकी है। तब हम सोचते हैं की इन लोगों के पास टीमवर्क, प्लानिंग, पोलिसी, स्ट्रेटेजी और पावरफुल पर्सन बेकिंग (इन्फ्लुएन्स) कितनी तगड़ी है, जिससे आधे खर्चे में और कम समय में ही हजारो गुना काम कर लेते है।
हमारे पास एक बार एक ड्राइवर आया था, यहाँ पर मैं उसका नाम उजागर नहीं करना चाहूँगा। वह पहले के जीवन में हिंदू था, वर्तमान में इशू को मान रहा है, और गले में क्रॉस लगाकर रखता है। किसी भी हिंदू देवी-देवता की तस्वीर अपने घर पर नहीं रख सकता और किसी भी हिंदू या जैन संतों के चरणों में नहीं झुक सकता।
[ इस में भी कुछ लोग अपवाद है, वो अपना नाम, अपना काम जारी रखते है यानी पब्लिक के बीच वो आज भी हिन्दू या जैन इत्यादि ही है, मंदिर में भी आना-जाना चालु है, लेकिन उन्हें भी टास्क दे रखा है। ]
मैंने उसे पूछा तो पता चला, उसे क्रीश्चन धर्म अपनाने के लिए कुछ हजार रुपये मिले थे, फिर गहराई में जाकर पूछा कि, अब तो तुझे चांदी-चांदी हो गई होगी, हर महिने कुछ न कुछ मिलता रहता होगा?
उसने कहा, ‘नहीं, ऐसा नहीं है, शुरू-शुरू में जो मिला वो ही मिला, बाद में तो हमें खर्चा भी करना पड़ जाता है।'
मैंने पूछा, ऐसा कैसे?
तो वह बोला, ‘कभी कोई धर्मशाला या चर्च इत्यादि बन रहा हो तो हम से भी चंदा उगाते है। टीप्स करते है तो हमें भी कुछ न कुछ देना पड़ता ही है।'
मैंने कहा, ‘यदि ना बोल दो तो?’
ड्राईवर बोला, ना नहीं बोल पाते हैं, वो लोग कुछ न कुछ बहाने बताते है, ये धर्मशाला जो बनेगी, उसमें आप के रिश्तेदारों को भी रुकना होगा, तो सुविधा रहेंगी इत्यादि....!
जगन रेड्डी की सरकार थी, तब आंध्रप्रदेश में मिशनरीज के मेम्बर्स ने हर स्कूलों में जा-जाकर बच्चों के दिमाग को कन्वर्ट करने का भी प्रयास किया था, जैसे ही सरकार बदली चन्द्रबाबु नायडू CM बने और कट्टर हिंदुत्व समर्थक, पिक्चर के हीरो पवन कल्याणजी डेप्युटी CM बनने के बाद सभी स्कूलों में सभी प्रकार के धर्मो की गतिविधि को रोक दिया गया, जिसके चलते जैन साधु-साध्वीजी भगवंतों को विहार में स्कूलों में मिल रहे स्थान भी मिलने बंद हो गये।
जड़ कानून कभी-कभी गलत को रोकने के चक्कर में अच्छे और सही को भी रोक देते हैं।
आंध्रप्रदेश के विहार में एक भाई ने बाईक रोक कर मेरे साथ वार्तालाप करने का प्रयास किया।
सामान्यरूप से विहार के दौरान बातचीत नहीं करने की भावना रहती है, फिर भी जिज्ञासु समझकर मैं खड़ा रह गया।
‘क्या आप सभी जगह चलते ही जाते हो?’ मैंने, 'हाँ' कही। थोड़ी बातचीत के बाद मुझे उस भाई ने सीधा ही पूछ लिया, 'आप इशु को क्यों फोलो नहीं करते हो?’
मैंने पूछा, इशु में ऐसा क्या है, जो आप मुझे फोलो करने के लिए प्रेरित कर रहे हो?
वह भाई बोले, ‘इशु सभी जीवों पर दया करते हैं।’
मैं बोला, 'यह कार्य तो मेरे प्रभु महावीर स्वामी भी कर रहे हैं, तो मुझे क्यों इशु को फोलो करना चाहिए?
अचानक मुझे क्या स्पार्क हुआ कि, मैंने प्रश्न पूछा, ‘क्या आप पूर्व में शिव, वैष्णव इत्यादि हिंदू धर्म को फोलो कर रहे थे? यानि क्या आप हिन्दू थे? हिन्दू देवी-देवता को अपना भगवान मानते थे?’
वह भाई ने हामी भरी। तब मैंने उसे दूसरा प्रश्न पूछा ‘क्या आप मांसाहार कर रहे हो?’ इस प्रश्न के जवाब में भी हामी भरी। फिर मैंने तीसरा प्रश्न पूछा, 'यदि ईशु सभी जीवों पर दया कर रहे है, तो ऐसे इशु के भक्त आप मांसाहार कैसे कर सकते हो?' क्या इशु ने आपको मांसाहार करने के लिए मना नहीं किया? बाईक वाले भाई बोले, ‘हम जिन प्राणियों का मांस खा रहे हैं, इशु के नजरिये से देखो, तो उन में आत्मा नहीं होती है।’ फिर खाने में दिक्कत क्या है?
मैंने चौथा प्रश्न पूछा, ‘आपने अपने आराध्य देवी-देवता को भगवान मानना क्यों बंद किया, इशु को अपना भगवान मानना क्यों शुरू किया?’
इस प्रश्न का जवाब दिया की, हमारे पूर्व के धर्म में जो भगवान थे, उनकी पत्नी है, किसी की तो दो-दो, चार-चार पत्नी भी है, और किसी की तो ज्यादा भी है। जबकि हमारे इशु तो ब्रह्मचारी है, इसलिए मैंने उसे फोलो करना शुरु कर दिया।
मैंने आखिरी सवाल पूछ लिया, 'यदि आप को ब्रह्मचर्य के हिसाब से ही अनुयायी बनना था, तो हमारे जैनियों के भगवान नेमिनाथ भी बाल ब्रह्मचारी के रूप में सुप्रसिद्ध थे, आप क्रीश्चन बन गये, उसके बजाय जैन धर्म भी अपना सकते थे ना?
हिन्दू में से क्रीश्चन बनने के बदले जैन बन गये होते तो? हमारे जैन धर्म में, हमारे महावीर स्वामी ने दुनिया के छोटे से छोटे जीवों को भी प्यार और सुरक्षा देने का काम किया है, विश्व के सभी जीव अपना सके ऐसा धर्म का मार्ग दिखाया है, और आज समस्त दुनिया में हमारे जीवन की तुलना कर सके ऐसे एक भी धर्म के एक भी धर्मगुरु शायद ही आपको मिल पायेंगे, जिस का कारण भी हमारे प्रभु ने बतायी संयम की व्यवस्था है। क्या आप जैन बनना पसंद नहीं करेंगे?
मेरा सवाल सुनकर वह भाई तो मौन हो गये, लेकिन उसके जाने के बाद अपने जिनशासन में फैली निष्क्रियता एवं दृष्टिहीनता का चिंतन करते हुए मैं भी मौन हो गया। अब मौन होने की बारी मेरो थी, क्योंकि कमी उस कन्वर्ट होने वाले व्यक्त्ति में नहीं, अपनी व्यवस्था में थी।
अक्सर आप लोगों को सचेत एवं सजग करने हेतु मैं नेगेटिव बातें लिखता रहता हूँ, लेकिन इस लेख में मुझे पोजिटीव बातें भी आप को बतानी हैं। तेलंगाना के अजैनों के अनुभव बहुत पोजिटीव रहे।
आंध्र और तेलंगाना के विहार में जैन लोगों के घर एवं स्थान बहुत ही कम मिले। विहार के दौरान हमारे ग्रुप के कई महात्मा निर्धारित समय से देरी से पहुँच रहे थे, जिसका कारण यह रहा कि, रास्ते में उन्हें रोक कर प्रश्नों की झड़ी बरसानेवाले कोई न कोई जिज्ञासु या भावुक लोग मिल ही जाते थे।
विहार के दौरान रोज-बरोज मिल जानेवालों के प्रश्न अक्सर इस प्रकार के रहते थे।
आप कौन हो? क्या आप चलते-चलते ही आगे के मुकाम पर पहुँचने वाले हो? क्या आप जीवनभर चलते ही रहते हो, कभी भी वाहन में बैठते नहीं हो? आप की भोजन व्यवस्था का क्या? क्या हम भी आप के जैसा जीवन अपना सकते है, आप जैसे बन सकते हैं? आप के साथ रह सकते हैं? क्या चलते चलते आपके पैर दर्द नहीं करते? दर्द करें तो दबा कौन देगा?
(क्रमशः)










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