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खूब चली गोली... खूब चली लाठियां, फिर भी अडिग रहे बागमाल बांठिया

  • 1 hour ago
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'आर्यावर्त की अखंडता, शासन की सर्वोपरिता’ 

महावीर के वंशजों की ये शपथ है, ये वीरों का पथ है।


इस आर्यावर्त को परतंत्रता की जंजीरों से जकड़ने के लिए अंग्रेजों ने जब अपनी कपटवृत्ति का सहारा लिया तब इस देश के वीर सपूतों ने जेल की जंजीरों से, फांसी के फंदे से और गोलियों की बौछार से डरे बिना, डगमगाये बिना स्वतंत्रता के नए इतिहास को अंजाम देने लड़ते रहे… आगे बढ़ते रहे।


6 अक्टूबर 1924 को कोटा के एक प्रतिष्ठित जैन परिवार में आपका जन्म हुआ। आपके ताऊ कस्तूरमल बांठिया का समाज में सन्माननीय स्थान था, वे प्रसिद्ध हिंदी लेखको में से एक थे।

राष्ट्र और समाज के विकास का दृष्टिकोण आपकी आनुवंशिक विरासत थी। इसीलिए छोटी उम्र से स्वतंत्रता के संग्राम में आपने सक्रिय भूमिका निभाने का साहस किया।


सन् 1941 में कोटा से मैट्रिक पूर्ण करने के पश्चात् आप कॉमर्स की पढ़ाई हेतु वर्धा गए। वर्धा जाने को लेकर आप विशेष उत्साहित थे, क्योंकि आपकी रुचि प्रारंभ से ही स्वतंत्रता आंदोलन में थी। और वहाँ सेवाग्राम आश्रम और पवनार आश्रम स्वातंत्र्यवीरों का गढ था।


सन् 1942 - 9 अगस्त के दिन जब सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया गया तब ग्वालियर टैंक मैदान में हुए झंडारोहण के आप प्रत्यक्ष साक्षी बने। आप उस समय मुंबई में तीन-चार दिन और रुके और आन्दोलन में भाग लेने पर आप पर भी पुलिस की एक लाठी पड़ी और पुलिस फायरिंग में आपके समीप खड़े एक व्यक्ति की मृत्यु भी हो गई।


मुंबई की इस खौफनाक घटना के बाद आप वर्धा लौटे। वर्धा में आने के बाद आपको ज्ञात हुआ कि अंग्रेज सरकार ने कॉलेज को सील कर दिया है और हॉस्टल भी खाली करवा दी है। उस वक्त इसके बाद आपने वर्धा में रहकर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लेना प्रारंभ किया। हिंगनघाट और आस-पास के कुछ गावों में एक ग्रुप बनाकर गए। वणी के एक सभा में भाषण के तुरंत बाद उपस्थित जनसमूह ने आक्रोशित होकर पुलिसकर्मियों की मार-पीट की। आप तुरंत वर्धा से कोटा लौट आए और गिरफ्तारी से बच गए।


कोटा में आंदोलन ठंडा पड चुका था। आपने अपने साथियों के साथ आन्दोलन की मशाल को पुनः प्रज्वलित किया और इसीके फल स्वरूप 17 सितंबर को गिरफ्तार किया गया । जेल में आपने अपने साथियों के साथ तीन दिनों तक भूख हड़ताल भी की।


अनेकविध यातनाओं को सहने के बाद आपको कारावास से मुक्ति मिली। कारावास से मुक्ति के पश्चात् पुनः आपने अपना विद्यार्थी जीवन शुरु किया। 


अध्ययन के पश्चात् आपने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने कदम बढ़ाए, और आपने अनेक साप्ताहिक अखबारों के माध्यम से अपनी लेखनी द्वारा जन-जागृति की मशाल प्रज्वलित की।

आपकी देशभक्ति और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण को व्यक्त करते हुए एक कवि ने लिखा है—


‘वतन के लिए जीना मेरा मकसत है, 

वतन के लिए मरना मेरी किस्मत है’।

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