top of page

जैनत्व वेदना… जैनत्व संवेदना… Part 2



गत प्रकरण में तेलंगाना राज्य में जिज्ञासु एवं भावुक लोगों के द्वारा पूछे गये प्रश्नों की सूचि जारी की थी, अब इस प्रकरण में कुछ अच्छे अनुभव आप से शेयर करना चाहता हूँ। गत प्रकरण में बताया था कि, तेलंगाना राज्य से जब विहार चल रहा था हमारे साथ रहे हुए महात्मा, विहार में स्थान पर पहुँचने में कभी-कभी देर कर देते थे, और जब उसका कारण पता चलता था तो आनंद होता था कि, चलो, अच्छे काम के कारण देरी हो तो अच्छी बात है।

अच्छे काम में देरी नहीं होनी चाहिए, लेकिन अच्छे काम के कारण देरी यदि होती है, तो मन में सुकून मिलता है। यहाँ पर एक दिशा खुल रही है, जो पाठकों को बतानी जरूरी लग रही है। प्रादेशिक भाषा में यदि किसी से बात करते हैं, तो अलग ही आत्मीयता का अनुभव होता है।


मेरे गुरुदेव श्री गुजरात में गए तब गुजराती में ही प्रवचन करने का सभी ने अनुरोध किया था। दिल्ली जाने के बाद हिन्दी में प्रवचन करने लगे थे और हिन्दी सभी को समझ में भी आ जाती है। हिन्दी में प्रवचन करने का दूसरा कारण हिन्दुस्तान में अधिकांश प्रजा हिन्दी जानती है और गुरुदेव श्री के प्रवचन इलेक्ट्रॉनिक - डिजिटल मीडिया में आने के बाद हिन्दी भाषा में प्रवचन करना आवश्यक भी था, फिर भी गुरुदेव श्री ने गुजराती को भी चुना क्योंकि स्थानीय लोगो को संतुष्टि तभी मिलती है, जब उनकी भाषा में आप बात करते हो।


तेलंगाना में और तमिलनाडु में हमारी मर्यादा आ गई, क्योंकि - हम में से किसी को भी प्रादेशिक भाषा का ज्ञान नहीं था। तमिलनाडु में तमिल चलती है, कर्णाटक में कन्नड़… हमने वहाँ देखा कि चर्च के बाहर एक डीजीटल डीसप्ले बोर्ड रहता है और प्रादेशिक भाषा में ही जिसस के बाईबल में लिखे वचनों को प्रदर्शित किया जाता है। छोटे-छोटे गाँवों में भी जो चर्च रहता है, वहाँ पर रखी घड़ी में हर एक घण्टे पर सुमधुर संगीत बजता है और संगीत के बाद सुंदर सुवाक्य, उपदेश प्रादेशिक भाषा में सुनाया जाता है। उपदेश का अनुवाद अंग्रेजी में भी होकर कर्णपथ पर आता है, तब मेरे जैसे साधु को विचार आता है कि हमारे जिनशासन में जिनालय के बाहर ऐसा डिसप्ले बोर्ड क्यों ना लगाया जाये, जिसमें से भगवान महावीर के उपदेश वचन जनता के कर्णपथ पर सरलता से पहुँच जाये। हिन्दू धर्म के मंदिरों से ठीक वैसे ही भगवत्‌ गीता के उपदेश वचन जब सुनें तब पता चला कि बाकी सभी धर्म के लोग, अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने में जी जान से लगे हुए है, सिर्फ अपने लोग थोडे ठण्डे पड़े है। मुझे यहाँ पर याद आ रहे है, मुनि श्री फलवृद्धिशेखर विजयजी महाराज साहेब जो कर्नाटक के ही मंड्या गाँव में जन्म लेकर दीक्षित (संन्यस्त) हुए और आचार्य श्री अजितशेखर सूरीश्वरजी म.सा. का चातुर्मास जब दावणगेरे में था, तब साथ में रहे इस महात्मा ने धमाका कर दिया था।


प्रादेशिक कन्नड भाषा में और अंग्रेजी में भी प्रवचन करने वाले इस महात्मा ने एक-एक दिन में चार-चार स्कूल -

कोलेजों में जा-जा कर हजारों छात्र-छात्राओं के हृदय में प्रभु वचनों की ज्योत जलाई थी। अपने गुरुदेव की किताब कन्नड में ट्रान्स्लेटेड जो थी एक लाख से अधिक संख्या में वितरित करवा दी थी। सिर्फ 5 साल के दीक्षा पर्याय में ऐसी विशिष्ट शासनप्रभावना करने वाले महात्मा को जो सफलता मिली उस में मुख्य हिस्सा प्रादेशिक भाषा के ज्ञान का था। प्रभुशासन को प्रचारित एवं विस्तारित करने के लिए हम ऐसे महात्माओं को क्यों तैयार नहीं कर सकते है, जो अलग -अलग राज्यो की लोकल लेंग्वेज में मास्टर हो। साथ में परमात्मा के वचनों को जानते हो और प्रेजेंटेशन में भी कुशल हो। चेन्नई में एक श्रावक मेरे गुरुजी को मिलने आए थे, कुछ समय के लिए उस श्रावक भाई को गुरुजी ने अपनी लिखित किताब ‘गर्जना’ पढ़ने हेतु दी तो पढकर वे बोले थे कि, ‘साहेबजी’! आप यदि तमिल भाषा में प्रवचन करने का मन बनाते हो तो मैं 50,000 लोगों को इकट्ठा करने की ताक़त रखता हूँ। 50,000 तो फिक्स है, आगे तो लाख-दो लाख भी इकट्ठा हो सकते है, क्योंकि आपकी किताबों में और प्रवचनों में आकर्षित करने की शक्ति तो है, लेकिन लोकल लेन्ग्वेज में जो आत्मीयता का अनुभव हो सकता है, वह और किसी भी भाषा में संभव नहीं है। दूसरे नंबर में अपने जिनशासन के जो गुरु है, ऐसे धर्मगुरु उन्हें मिले नहीं है। मुझे सभी बातों का एक ही निष्कर्ष दिख रहा है कि हम अपने-अपने कार्यक्रमों या अनुष्ठानों को तो प्रचारित करते है, परन्तु जिनशासन की बातों को फैलाने में (प्रचारित करने में) बहुत ही पीछे है।


जैनसाधु मोबाईल- इलेक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रहे, वो अच्छी बात है, लेकिन जो सोशल मीडिया में ही डूबे हुए

है, ऐसे युवा श्रावकों को हम महावीरप्रभु के वचनों के प्रचार-प्रसार करने के लिए ट्रेण्ड होने की प्रेरणा क्यों नहीं दे सकते है?


तेलंगाना में एक भाई फलों से भरी खुली रिक्षा लेकर जा रहे थे। हमारे महात्माओं को देखकर खड़े रह गये। फिर तेलगु भाषा में कुछ बोले, महात्मा को कुछ समझ में नहीं आया तो फलवाले भाई ने अपनी रिक्षा में से एक संतरा (orange) उठाकर देना चाहा, महात्मा ने लेने से इन्कार किया तो बार-बार देने के लिए फोर्स करने लगे, फिर भी महात्मा ने जब नहीं लिया तो उस भाई को लगा कि संतरा नहीं चलता होगा। संतरा छोड़कर चीकू हाथ में लेकर फिर से अतिआग्रह करने लगे, तेलगु में बोलने लगे कि आपको लेना ही पड़ेगा। चीकु नहीं लिया तो तीसरा फल उठाया, पर भाव देखों तो पराकाष्ठा के… आख़िर महत्मा ने एक्शन कर-करके मुश्किल से समझाया कि, हमें अभी एक भी फल नहीं चलेंगे।


एक मुस्लीम भाई ने हमारे एक महात्मा को खड़ा रखकर विनंती की। मेरे भोजन के डिब्बे में से आप कुछ न कुछ ले लो। सूर्यास्त के बाद जैनमुनि भोजन या पानी का एक बूंद भी नहीं लेते है, इस बात से अनभिज्ञ वह मुस्लीम भाई विनंती कर रहे थे। जब महात्मा ने लेने से इन्कार किया, तो अपना डिब्बा खोलकर बताया कि, 'देखों इस में नुक्ती का लड्डू है, फल है, और सब शाकाहारी भोजन है, मांस अंशमात्र भी नहीं है। अभी रमजान है और मैंने जो रोजा रखा है, वह अभी-अभी छूटा है। फिर महात्माने प्रेम से मना करके जब बताया कि, सूर्यास्त के पश्चात् जैन साधु कुछ भी ना खाते है, वा पीते है, तब उस भाई को जिंदगी में पहली बार जैने साधु के – त्याग की जानकारी मिली। वो भाई नतमस्तक हो गये।


हमारे विहार के साथ-साथ हमारे (सांसारिक रिश्तों से) बहन साध्वीजी महाराज के ग्रुप का भी (चेन्नई से औरंगाबाद का) विहार चल रहा था। तेलंगाना में रास्ते पर खड़े एक बहन, साध्वीजी महाराज के ग्रुप (13 साध्वीजी) को देखकर नाचने ही लगे और बोले कि आज मुझे भगवान के साक्षात दर्शन हो गये। अपनी फलों की बाड़ी में से पक्का पपीता लेकर सामने दौड़े। लेना ही पड़ेगा - लेना तो पड़ेगा ही, ऐसा फोर्स करने लगे। आखिर साथ में जो व्हीलचेयर चलाने वाली महिला थी, उसको देकर ही रही। पपीता देकर भी रुके नहीं, अपनी भावना प्रदर्शित की, आप अब गर्मी की मौसम में यहाँ आना, मैं अपने फार्म हाउस के आम खिलाऊँगी।


तेलंगाना की बॉर्डर के पास, साध्वीजी भगवंत (श्री धैर्यनिधि श्रीजी) म. के ग्रुप को विहार करते हुए देख कमिश्नर की गाड़ी रुक गई। कमिश्नर ने उनसे बात की और फिर कहा कि आप महाराष्ट्र में प्रवेश ना करो तब तक 3/4 दिन तक पोलीस की सुरक्षा आपको मार्ग में मिलती रहेगी। हमने माँगी नहीं थी फिर भी Police Security सामने से करने के भाव एक अजैन कमिश्नर को हो, वह कितनी बड़ी बात है, हम आपको इस रास्ते पर अकेला नहीं छोड़ सकते, ऐसा कहने वाले इस कमिश्नर साब को जन्म से जैनधर्म नहीं मिला है फिर भी अहोभाव और विवेक किसी की बपौती (मोनोपॉली) नहीं है। कमिश्नर कक्षा के लोग IAS officer जो होते है, वो बुद्धि के बेताज बादशाह होते है, और कई बार दिल गायब होता है, लेकिन यहाँ तो हदय भी अद्भूत…और दिमाग़ भी मजबूत…


तेलंगाना की कई सारी स्कूलों में हमने हिंदी में प्रवचन किया, और वहाँ रहे टीचर्स तेलगु में अनुवादित करके बच्चों को एक-एक शब्दों के अर्थ समझाते थे। एक स्कूल के टीचर तो जैन महात्माओं की आचार मर्यादा से इतने प्रभावित हुए की आगे के स्थान के सर्वे के लिए सभी प्रकार की सहायता भी कर दी, अपनी ख़ुद की बाइक भी दे दी (पहले सर्वे के लिए किसी जैन श्रावक को help करने के लिए बोला था, तो उसने ना सहायता की, और जो कर रहा था उसे भी रोक दिया था। तब एक Non Jain टीचर की कैसी उदारता!)


हमारे तेलंगाना के विहार के दौरान… एक अनुभव ऐसा हुआ कि, विहार करते महात्मा को देख एक भाई सीधे ही गाडी में से नीचे उत्तर गए और महात्मा के सामने 500/500 रुपयों की नोटों की गड्डी ही सीधी खोल कर रख दी। जो दो महात्मा चल रहे थे, वो रुक गये, गाडी वाले भाई ने सीधा ही महात्मा को प्रश्न पूछा कि “आपकी भोजन की व्यवस्था क्या है? मेरी ओर से ये रख लीजिए” ऐसा बोलकर हमारे महात्माओं को 500/500 रुपये देने की कोशिश करने लग गये। महात्मा ने जब स्पष्टता की, कि हम इस रूपयों को हाथ भी नहीं लगा सकते है, तब पहली बार उस श्रीमंत भाई को पता चला कि जैन साधु भगवंत पैसों को छूते तक नहीं है। पता लगते ही नतमस्तक हो गए।


क्या जनसामान्य में हम इतना संदेश भी नहीं पहुंचा पाये है की जैन श्रमणों का जीवन कैसा है? आज भी हजारों साधु -

साध्वीजी जीवनभर के लिए रात्रिभोजन के त्यागी, रात्रि में कितनी भी गर्मी हो ठण्डा तो क्या गर्म या गुनगुना पानी पीने  से भी दूर रहने वाले इन श्रमण-श्रमणियों के परिचय करवाने का दायित्व किस का?


जीवनभर पत्नी या प्रेमिका तो छोड़ो, अपनी माता, बहन या दो महीने की बच्ची को भी स्पर्श नहीं करने वाले जैन श्रमणों के बारे में इस भारत देश में भी कितनें को जानकारी होगी, इस की जानकारी है क्या?


Bank Account ख़ुद का तो नहीं है, लेकिन डिजिटल करन्सी, Real Money (सोना-चाँदी) या Paper करन्सी को भी हाथ नहीं लगाने वाले हजारों साधु-साध्वीजी भगवंतों के बारे में कौन जानता होगा?


अपने मस्तक के एवं दाढ़ी-मूंछ के बाल मशीन से नहीं, हाथों से उखाड़े जाते है, ऐसे जैन श्रमणों के श्रमणाचार से अवगत कराने का काम किसका?


हमारे प्रभु के बनाये वचनों को, प्रभु की आज्ञा पर चलने वाले श्रमणों को, दुनिया के सामने लाने से जो अहोभाव लोगों की आँखों में दिखता है, ऐसा कहीं पर भी देखा नहीं गया है। कितने सारे लोग बिल्कुल सरल एवं सहज होते है। निर्दोष एवं  पवित्र होते है, लेकिन हम उसे जोड़ते ही नहीं है, तो वो और कहीं पर जुड़ जाते है।


सम्यग् दर्शन बोधिबीज़ जब आत्मा की भूमि पर पड़ते है, तब कैसा विस्मयभाव प्रकट होता होगा या कितनी मात्रा में अहोभाव का स्पर्श होता होगा, ये तो विशेष ज्ञानी जानें, लेकिन एक बात अवश्य बतानी है कि, हमने बहुत देर कर दी है,  अपने जिनशासन को समझने में, समझकर प्रेम करने में, प्रेम करने के बाद प्रचारित करने में शायद हमें रुचि ही नहीं है। हमें रोज-रोज जो महात्माओं का दर्शन सहजरूप से मिल जाता है, हमारे लिए वह बस एक रूटीन हो चुका है और ऐसे रूटीन के लिए हमारे दिल में कोई रुचि नहीं है, लेकिन ऐसे महात्माओं के सिर्फ़ एक बार दर्शन मिलने मात्र से ही उन भावुक लोगों के मुख से सहजता से एक सेन्टेन्स निकल जाता है ‘I love you..!’


मुझे लग रहा है कि, हमने जिनशासन में जन्म लेकर इतनी प्रगति कर ली है कि अब हमें आगे बढने का शायद कोई इंट्रेस्ट ही नहीं है। याद कीजिए श्री ऋषभ देव को… जब वो गोचरी लेने के लिए निकलते थे, तब लोग सोने-चांदी - बेटे-बेटियों की भिक्षा भी देने के लिए तैयार थे, वे लोगो के पास भाव तो बहुत था, पर ज्ञान नहीं था कि प्रभु को भिक्षा में देना क्या है। और प्रथम तीर्थंकर के काल से अब हम अंतिम तीर्थंकर प्रभु के अंतिम शासन काल में जी रहे है, तब कहने का मन हो रहा है कि, गोचरी वहराने का हमारे दिमाग़ में ज्ञान तो बहुत है, लेकिन भाव नहीं है।


कौन सी अवस्था अच्छी मानी जायेगी? ज्ञान ना हो और भाव भरपूर हो वो या भाव ना हो और ज्ञान भरपूर हो वो?

कौन सी व्यवस्था पसंद करना चाहोगे?


आराधना का रूटीन सेट हो पर रुचि ना हो वो? या आराधना की रुचि भरपूर हो पर रूटीन सेट ना हुआ हो वो?


(क्रमशः)

Comments


Languages:
Latest Posts
Categories
bottom of page