अभी भी सोना है? तो बाद में रोना है...
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यहाँ पर कुछ घटनाएँ एवं उन घटनाओं के घटित होने का समय बताया जा रहा है। इन घटनाओं का निष्कर्ष एवं भविष्य की संभावनाएँ भी साथ में प्रकाशित कर रहे हैं।
1. दिसंबर 2024: छत्तीसगढ़- रायपुर, लाभांडी स्थित दिगंबर जैन मंदिर में से चोर लोग, भगवान की मूर्ति छोड़कर बहुत सारा कीमती सामान चुराकर ले गए - गहने, भंडार (दानपेटी) इत्यादि।
2. अगस्त 2025 राजस्थान- अलवर, जैन मंदिर में से चाँदी के छत्र, अन्य कीमती सामान तथा लाखों रुपयों की संपदा चोर चुराकर ले गए। ये वही मंदिर है जहाँ से पहले भी अनेक कीमती चीजें चोर चुराकर ले गए थे, उस वक्त भी पुलिस निष्क्रिय रही थी और इस बार भी पुलिस की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया है, सिर्फ लीपापोती हो गई है।
3. 26 अगस्त 2025 उत्तर प्रदेश-ललितपुर-ग्राम चिगलौआ। वहाँ पर स्थित जैन मंदिर जो कि 500 साल पुराना है। अमर उजाला U.P. का प्रसिद्ध अखबार है, उसमें 26 अगस्त को छपी यह News है तकरीबन 400 साल पुरानी भगवान पार्श्वनाथ की अष्टधातु की 7 प्रतिमा एवं दानपात्र, मुकुट + 2 kg चाँदी के बर्तन, अन्य कीमती सामान चोर चुराकर ले गए।
आश्चर्य इस बात का है कि सन् 2014 में इसी मंदिर के ऊपर लगा हुआ सोने का कलश चोरी हुआ था, लेकिन आज तक उस कलश का पता नहीं चल पाया है। विडंबना देखो, चोरी होने के बाद भी फिर से उसी मंदिर में चोरी हो रही है और लोग सो रहे हैं।
4. 10 या 11 अक्टूबर 2025: दिल्ली-ज्योतिनगर, जैन मंदिर का लोकेशन । North East दिल्ली के इस मंदिर से करवा चौथ की रात को तकरीबन 25 से 30 किलो वजनी गोल्डन कलर का अष्टधातु से बना कलश जिसकी अंदाजन कीमत 40 से 50 लाख रुपये है, चोरी हो जाता है।
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक घटना CCTV में रिकॉर्ड हो जाती है। पुलिस यहाँ पर एक्शन मोड में आती है और 13 अक्टूबर को दो स्क्रेप डीलर को पकड़ती है, उनके पास से चोरी किया गया कलश जब्त कर लेती है। 5 नवंबर 2025 के दिन मुख्य चोर 23 वर्षीय मुन्ना उर्फ सलीम को पकड़ लिया गया।
5. 13 अक्टूबर 2025 : अहमदाबाद-लक्ष्मीवर्धक जैन संघ (पालड़ी एरिया) के जैन मंदिर। मंदिर का पूजारी मेहुल राठौड़ एवं सफाई कर्मचारी दंपति ने मंदिर में भगवान की चाँदी की हाथसफाई (चोरी) कर ली। चोरी पिछले डेढ़-दो सालों से चल रही थी। 117.33 kg चाँदी बेची थी किसी जैन को ही। मंदिर के गर्भगृह (गंभारे) में प्रभु के पीछे बनी चाँदी की पिछवाई को निकालकर मंदिर के ट्रस्टियों ने संघ के तहखाने (underground) में रख दी थी। मंदिर का कोई काम चालू होने के कारण वहाँ रख दी थी और तहखाने की चाबियाँ सफाईकर्मी एवं पूजारी के पास थी। तो सफाई करने वालों ने सफाई के साथ-साथ चाँदी की भी सफाई कर ली। 1.64 करोड़ की चाँदी गायब हुई तब पता चला कि यह कांड तो डेढ़-दो सालों से चल रहा था। 49 लाख रुपयों की चाँदी तो रिकवर हो गई लेकिन अंधेरा अभी पूरा छँटा नहीं है।
मुझे प्रश्न ये होता है कि घर की तिजोरी जहाँ अमूल्य खजाना, सोना-चाँदी रखते हैं, उसकी सफाई का काम हम अपने नौकर को नहीं सौंपते तो मंदिर की कीमती चीजें जहाँ पड़ी हों, उसकी सफाई का काम हम ऐसे लोगों को कैसे दे सकते हैं? ऐसा तो नहीं है न कि घर की संपत्ति हमारी है, मंदिर से हमें क्या लेना-देना? वहाँ यदि चोरी होती है तो उसमें हमारा क्या जा रहा है? जो जा रहा है वो भगवान का ही जा रहा है ना?
6. राजस्थान-झालावाड़ : सुप्रसिद्ध चाँदखेड़ी जैन मंदिर से 5000 साल पुरानी मूर्ति की चोरी हुई। नवम्बर 2025 में इस चोरी के लिए मंदिर प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष को भी गिरफ्तार किया गया।
7. 15 नवम्बर 2024 : महाराष्ट्र-पुणे-स्वारगेट-भगवान की प्रतिमा का सोने का मुकुट और स्वर्ण चैन की चोरी हुई। हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक 9 Dec. 2024 के दिन चोर मुंबई से पकड़ा गया। चोर ने पूजा के वस्त्रों में आकर चोरी की थी। यानी अब चोर पूजा करने वालों के भेष में भी आने लगे हैं।
8. गुजरात-बड़ौदा करजण के पास देथल नाम के गाँव का जैन मंदिर, लाखों रुपयों के सोने-चाँदी की चीजों की चोरी हुई।
9. गुजरात-सूरत-अडाजण : सन् 2025-गुरु राम पावन भूमि जैन मंदिर। संगमरमर की जाली तोड़कर चोर अंदर घुसे, भंडार तोड़ा, जैन प्रतिमा से जुड़े चाँदी के टीके-कपाली उखाड़ कर ले गये। बहुत सारा सामान चाँदी एवं अन्य धातुओं का लेकर गये।
10. राजस्थान-बांसवाड़ा : दिनदहाड़े चोरी हुई। गढ़ी प्रतापपुर गाँव के जैन मंदिर का भंडार लूटा गया और चाँदी-सोने की चीजें चुराकर ले गये। यहाँ पर तो चोरों ने जूते भी बाहर निकाले यानी चोर भी भगवान का सम्मान करना जानते थे।
11. राजस्थान का करजण इंडस्ट्रियल एरियाः शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में भी इसी प्रकार चोरी हुई।
12. 3 March 2025 (F.I.R. Report के मुताबिक ) : तमिलनाडु- चेन्नई-मिंट स्ट्रीट-नया मंदिर (चन्द्रप्रभस्वामी जी का)। आधा किलो स्वर्ण के आभूषण एवं 10 किलो चाँदी की चोरी हुई। 12 फीट ऊँची दीवार फाँदकर चोर अंदर आये थे जो CCTV में रिकॉर्ड भी हुआ है लेकिन अभी तक चोर हाथ में नहीं आया, न चीजें।
13. ठीक 6 साल पहले उसी चेन्नई के जूना मंदिर (पुराना मंदिर) में से चाँदी एवं सोने की करोड़ों रुपयों की चीजें चोर चुराकर ले गये। इस चोरी में तो चोरी के साथ-साथ चौकीदार (या पुजारी) का मर्डर भी हो गया था।
14. राजस्थान-सिरोही डिस्ट्रिक्ट : गाँव जावाल-5 नवम्बर 2025 के दिन (गाँव के बाहर रही हुई आम की बाड़ी में स्थित आदिनाथ श्वेताम्बर जैन मंदिर) जहाँ प्राचीन आदिनाथ जी विराजित हैं और पूर्णिमा इत्यादि पर्वों में गाँव वाले आते-जाते रहते हैं। ऐसे जिनालय से 5 नवम्बर 2025 को चोरी हो गई। भगवान के ऊपर लगे चाँदी के टीके, सोने की कपाली उखाड़-उखाड़ कर ले गये। जहाँ-जहाँ चोरों को चाँदी-सोने की आशंका हुई, भगवान को नुकसान पहुँचाते हुए उखाड़-उखाड़ कर ले गये। उस मंदिर के बाहर रहे आजू-बाजू के CCTV डेढ़ महीने से बंद पड़े थे। गाँव जावाल में 550 घर खुले हैं लेकिन एक भी घर इस चोरी को होते हुए रोक नहीं पाया।
भगवान आदिनाथ के मंदिर में हुई इस चोरी की दुर्घटना से मुझे भगवान आदिनाथ के समय का किस्सा याद आ गया। भरत चक्रवर्ती, जिसके नाम से इस देश का नाम भारत पड़ा है, प्रभु ऋषभदेव के प्रथम पुत्र। विवेक एवं दीर्घदर्शिता से हरे-भरे भरत ने अष्टापद पर्वत के ऊपर अपनी उत्कृष्ट भक्ति को प्रदर्शित करते हुए रत्नों की, मणि-माणक-स्वर्ण-चाँदी इत्यादि मूल्यवान धातुओं की प्रतिमाएँ बनवाई। बनवाकर रुक नहीं गये। सतयुग होने पर भी बढ़ते अपराधों को देखकर आने वाले भविष्य को भाँप कर उन्होंने वहाँ पर यंत्रमानव नियोजित किए थे।
उस जमाने में कोई भी व्यक्ति यंत्रमानव की कल्पना भी नहीं कर सकता था..... उस जमाने में स्वचालित यंत्रमानव रखना कोई छोटी बात नहीं है। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के बिना की गई भक्ति कई बार आशातना का कारण बन सकती है। भरत महाराजा का स्पष्ट संदेश था कि हम आने वाले कल एवं काल का भरोसा नहीं कर सकते।
यदि भरत महाराजा सतयुग में भी समझदारी दिखाकर भगवान की रक्षा के लिए पुख्ता बंदोबस्त कर सकते हैं, तो इस घोर कलिकाल में हम किस बात का इंतजार करना चाहते हैं? किसका भरोसा अब कर सकते हैं भला? जहाँ पुजारी-सफाई कर्मचारी और ट्रस्टी जैसे लोगों के ऊपर भी चोरी का इल्जाम लग सकता है, इस भयानक कलिकाल में भगवान के सिवा कोई भी भरोसा पात्र नहीं है, ऐसा क्या आपको नहीं लगता है? भरत के बाद आये सगर चक्रवर्ती के 60,000 बेटों ने तो और आगे की योजना बनाकर और अधिक सुरक्षा के प्रबंध करने की सोची। भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए उन्होंने उसी अष्टापद पर्वत के चारों दिशा में खाई खोद कर उसमें गंगा नदी का पानी लाने का काम किया।
आजकल जिस प्रकार महंगाई बढ़ती जा रही है, लोगों के शौक, पागलपन की चरम सीमा को पार करके आगे ही आगे कुच कदम करते जा रहे हैं। लोगों की नैतिकता पर जिस प्रकार प्रश्नचिह्न लगते जा रहे हैं, लोगों की मानसिकता में जिस प्रकार परिवर्तन देखा जा रहा है, इन सभी चीजों को मिलाकर जो दृश्य उभरता जा रहा है, वह बड़ा ही खौफनाक है।
सोना-चाँदी के दाम जिस प्रकार बढ़ते ही बढ़ते जा रहे हैं, आने वाले समय में सबसे सॉफ्ट टारगेट मंदिर और मंदिर में रही मूर्तियाँ होंगी।
उसमें भी जो दूरदराज के क्षेत्र के मंदिर हैं जहाँ पर सोना-चाँदी की भारी मात्रा है, रात में भीड़ कम है, आजू-बाजू घर कम हैं, फिजिकल सिक्योरिटी कमजोर है, चोरों के लिए परफेक्ट कॉम्बो है।
मंदिरों में चोरी की कई सारी घटनाओं का निष्कर्ष देखने पर पता चलता है कि हमारे लिए हाई वैल्यूएबल मेटल केंद्र स्थान पर है पर उससे भगवान को पहुँचने वाली हानि बिल्कुल ही गौण स्थान पर है, या तो है ही नहीं।
सुरक्षा के पुख्ता प्रबंधन के बिना ही भगवान को कीमती चीजें समर्पित किये गये। सोने-चाँदी से हम चोरों को आमंत्रण पत्रिका दे रहे हैं- "आइये और हमें लूट कर जाइये"। या तो अत्यधिक भीड़ (फेस्टिवल) का समय, या फिर जनशून्य समय ही चोरों के लिए श्रेष्ठ समय होता है, और दोनों प्रकार का माहौल हमारे यहाँ जगह-जगह पर दिख रहा है।
जिसकी निष्ठा जाँची-परखी नहीं गई है, ऐसे लोगों पर पूरा भरोसा करना भी आत्महत्या के बराबर है, जिससे इस चोरी की वारदातों में अंदर के लोगों को भी सम्मिलित होने का बराबर का मौका मिल जाता है।
एक-दो बार चोरी किए जाने के बावजूद हमारी निष्क्रियता एवं उपेक्षा भी चोरों को बार-बार चोरी करने के लिए उकसाती है। एक मंदिर में चोरी हुई, प्रभु के मुकुट की चोरी करता हुआ चोर CCTV में दिख रहा है, फिर भी सभी ट्रस्टी महोदय ठंडे पड़े हुए थे और मीटिंग में चर्चा कर रहे थे कि पुलिस चौकी या कोर्ट इत्यादि का धक्का कौन खायेगा इसलिए FIR कराना उचित नहीं है। इससे बेहतर विकल्प यह रहेगा कि अपने पास अत्यधिक पड़ी देवद्रव्य की राशि का सदुपयोग (?) करके एक नया चाँदी का मुकुट बनवा लिया जाये। संघ में भी इस चोरी के खिलाफ उठ रही आवाज को चुप कराने का इससे अच्छा कोई रास्ता नहीं है।
ललितपुर का किस्सा पहले ही बता दिया है, जहाँ 2014 में सोने के कलश की चोरी हो चुकी थी, उपेक्षा के कारण सन् 2025 में फिर से चोरी को अंजाम दिया गया। पाठक यदि भूल गये हों तो इसी लेख में शुरू में लिखा तीसरा नंबर का ललितपुर का किस्सा पुनः पढ़ लें। हम भुलक्कड़ हैं, और ऐसी बातों को भूलने की हमें आदत है जो बिल्कुल भी भूलने जैसी नहीं हैं।
अहमदाबाद की एक को-ऑपरेटिव बैंक में रखी करोड़ों की राशि, जब बैंक के दिवालेपन के कारण फ्रीज हो गई तब मेरे गुरुदेव श्री ने यह प्रश्न भरी सभा में पूछा था- भगवान की देवद्रव्य की राशि गई तो किसकी नींद हराम हुई? किसने धक्के खाये ? कौन परेशान हुआ? कौन-कौन रोया? हम इतने गैर-जिम्मेदार कैसे बन सकते हैं? भगवान की राशि हम ऐसी जगहों पर कैसे रख सकते हैं जिसका भरोसा रखना मुश्किल है?
हकीकत यह है कि हम अपने संघ में एकत्रित पैसों का सदुपयोग या उपयोग बिल्कुल भी नहीं जानते हैं। दुरुपयोग हो या चोरी हो जाये तो हम एक या दो दिन में उसे भूल भी जाते हैं।
अभी मैं दक्षिण भारत में विचरण कर रहा हूँ। बैंगलोर, चेन्नई इत्यादि महानगरों के जैन मंदिरों में रहे मूलनायक प्रभुजी से लेकर सभी भगवानों के चक्षु हीरे के बने हुए देख कर मुझे बड़ा दर्द महसूस हो रहा है। मुझे लगता है कि हम भक्ति की मूल भावना ही भूल गये हैं। जिस अंजनशलाका के कारण प्रभुजी पूजने लायक बनते हैं, उस अंजन का मुख्य केंद्र ही प्रभु की आँखें हैं, यदि उस आँखों में ही आप हीरे जड़ देंगे तो प्रभु की करुणा कैसे महसूस कर पायेंगे?
मेरे गुरुदेव श्री इस चीज के सख्त विरोधी हैं। हीरों के कारण प्रभु की आँखें अखण्ड नहीं रहती हैं, टुकड़े-टुकड़े में विभाजित हो जाती हैं क्योंकि आँख में कोई एक हीरा तो लग नहीं रहा है। आँख अखण्डित होनी चाहिए, खण्डित या टुकड़ों वाली नहीं।
आँखों में लगने वाले हीरे भी दो प्रकार के होंगे: 1. असली, 2. नकली।
यदि नकली हीरे लगाते हो तो प्रभु की आशातना है। यदि असली हीरे लगाते हो तो प्रभु की आँखें चुराने का किसी का भी मन हो जायेगा और यदि उसने प्रभु की आँखों पर प्रहार किया तो अंजनशलाका की विधि का क्या होगा? विधि की तो बात छोड़ो, हम तो प्रभुजी को जीवंत ही मानते हैं, प्रभुजी का क्या होगा? हमने ही सामने से 'आ बैल मुझे मार' जैसी स्थिति पैदा की है। चोर प्रभुजी के चक्षु उखाड़ कर ले गये हों ऐसी घटना भी कई बार घटित हो चुकी है, कारण? एक ही दिख रहा है मूल्यवान वस्तुओं से प्रभु को बैंक देना।
हमें गहने कितने भी पसंद क्यों ना हों, सोना-चाँदी कितने भी अच्छे क्यों ना लगते हों, हम कभी भी अपने शरीर पर सोने-चाँदी के आभूषण कील मारकर या गोंद लगाकर चिपकाते नहीं हैं, तो फिर प्रभुजी के भाल पर कपाली चिपकाने का, टीके लगाने का क्या अर्थ है? क्या आप प्रभुजी की प्राणप्रतिष्ठा के बाद भी प्रभुजी को जीवित नहीं मानते हैं?
पूर्व के जमाने में पाषाण में ही प्रभुजी के आभूषण उकेरे जाते थे। कांगड़ा इत्यादि तीर्थों के अंदर रही प्रभु-प्रतिमा को आप निहारेंगे तो आपको पता चल जायेगा। 2000, 5000 साल पुरानी प्रतिमा जब जमीन से निकलती है तो कहीं पर भी भगवान के ऊपर परमानेंट टीके या कपाली लगी हुई मिलती नहीं है, तो हम क्यों ऐसा पागलपन कर रहे हैं?
आज इस लेख लिखने का विशेष प्रयोजन है क्योंकि अभी जिस प्रकार स्वर्ण और चाँदी के दाम ऊपर-ऊपर जा रहे हैं, मुझे प्रभुजी की आशातना का (चोरी के माध्यम से होने वाली हानि का) सबसे बड़ा डर सता रहा है।
आज करोड़पति और पावरफुल लोग भी असली सोने की चीजें ज्यादा पहनने से, रोज-रोज पहनने से बच रहे हैं क्योंकि जमाना बहुत खराब हो रहा है। तो हम भगवान को ऐसे ही कैसे छोड़ सकते हैं?
सिद्धांत दिवाकर स्वर्गीय पूज्यपाद गच्छाधिपति श्रीमद्विजय जयघोषसूरिजी म.सा. का तो यहाँ तक कहना था कि पहले के जमाने में जनसामान्य के बीच में रहे मंदिर-उपाश्रय को कभी ताले नहीं लगते थे यानी वो मांगलिक नहीं होते थे। वहाँ पर ऐसी कोई मूल्यवान चीजें ही नहीं रहती थीं कि चोरों को चोरी करने की बुद्धि जगे। लेकिन कलिकाल में तो पाषाणमय प्रभु की प्रतिमा भी चोर लोग बेचने लगे, इसलिए मंदिर की सुरक्षा करनी पड़े ऐसी स्थिति खड़ी हुई। मंदिर एवं मूर्ति की सुरक्षा के लिए ही मांगलिक करना अति आवश्यक है।
मुर्गी के बच्चे के जीवन और मृत्यु में बस थोड़ा सा अंतर है। अण्डा फूटता है तो जिंदगी भी हो सकती है, मृत्यु भी। यदि अंदर से, अंदर रहा हुआ जीव अण्डा फोड़कर बाहर निकलता है तो जिंदगी मिलती है, लेकिन यदि बाहर से फोड़ा जाता है तो मौत मिलती है।
बाहर वाला यदि सोना-चाँदी उखाड़ कर ले जाये तो चोरी मानी जाएगी, लेकिन अंदर वाले यदि सोना-चाँदी के टीके इत्यादि हटा देंगे तो समझदारी मानी जाएगी। और समझदारों को इशारा ही काफी होता है।
जब इकोनॉमिक क्राइसिस (आर्थिक मंदी) का काल पूरे विश्व में बजने की तैयारियाँ हो चुकी हैं, ऐसे विषम काल में अपने भगवान पर सोना-चाँदी-हीरा चढ़ाया हुआ जब आम जनता में देखा जायेगा तब शासन की अलग स्वरूप में बदनामी का, शासन की हीलना का भी एक खतरा मुझे महसूस हो रहा है।
आज अत्यधिक राशि के रूप में बैंकों में पड़े देवद्रव्य का भी हम उचित उपयोग नहीं करते हैं तो लोकनिंदा का और अपने ही शासन के आराधकों के द्वारा उठाये गये प्रश्नों का सामना हमें करना पड़ता है।
तब महंगे से महंगे आभूषणों से प्रभुजी को सजाना कितना उचित है, विद्वान निर्णय करें।
यदि कोई पर्सनल व्यक्ति अपने भक्ति भाव से, अपने घर पर या ऐसे स्थान में पुख्ता सुरक्षा के बंदोबस्त के साथ प्रभुजी को सजाता है, महंगे गहनों की आंगी रचाता है तो उसमें मेरा कोई विरोध नहीं है, लेकिन परमानेंट चिपकाना बिल्कुल आशातना का कारण लग रहा है।
जिसे चिपकाने पर भी आशातना होती है, उसे यदि उखाड़ा जाता है तब भी आशातना होती है। लेकिन मेरी दृष्टि में हम सावधानी से चिपकाये हुए टीके को निकाल कर उस हिस्से को लेप-ओप से भर सकते हैं। लुटेरे या चोर यदि उखाड़ कर ले जायेंगे तो उसमें अत्यधिक हानि पहुँचने की संभावना है। कुछ साल पूर्व 2200 वर्ष प्राचीन नेमिनाथ प्रभु की प्रतिमा के बारे में सुना था। नाडलाई शहर में पर्वत पर रही वो प्रतिमा के गले में जड़ी महंगी धातु की पट्टी उखाड़ कर ले जाने के लिए किये गये शस्त्र के प्रहार से भगवान का मस्तक ही धड़ से अलग हो गया। आने वाले समय में ऐसे दृश्यों को क्या हम बर्दाश्त कर पायेंगे?
क्या आप अपने बेटे को इतना ज्यादा प्यार करते हैं कि उसके गले में एक पट्टा सोने का बनाकर जड़वा दें? कई जगह पर तो छाती के हिस्से में भी चाँदी या सोने या अन्य धातु के टीके जड़ देते हैं, किसलिए? इसका क्या औचित्य है भला?
जब पाषाणमय प्रतिमा भी 'एन्टीक' और 'यूनिक' के नाम से चोरी होकर करोड़ों में बिक रही है तब सोने-चाँदी का भद्दा प्रदर्शन किसे बचायेगा?
अंग्रेजों के जमाने का एक किस्सा है। एक नवपरिणित युगल (दंपति) रेल से यात्रा कर रहा था। स्टेशन पर उतरने के बाद पति-पत्नी चल रहे थे और एक अंग्रेज अफसर ने पत्नी का हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा। वो चिल्लाई लेकिन पति कमजोर एवं कायर निकला, कुछ प्रतिकार कर नहीं पाया। तब एक हट्टा-कट्टा तंदुरुस्त, चुस्त बदन वाला देशप्रेमी युवा बीच में आया, उसने अंग्रेज अमलदार को मजा चखाया, उस कायर की पत्नी को छुड़वाया, फिर पत्नी को पति के हाथों सौंपते हुए बोला :
'यदि सुरक्षा नहीं कर पा रहे हो, तो शादी क्यों की?'
मैं आज जैन संघ के प्रमुख पदाधिकारियों को भी यही प्रश्न पूछना चाहूँगा : 'आप यदि भगवान की सुरक्षा नहीं कर पा रहे हो तो सोने-चाँदी से भगवान को सजा क्यों रहे हो? कहीं सजावट ही सजा न बन जाये।'
गुजरात के एक छोटे से टाउन में जैन लोग पूजा करने जिस जैन मंदिर में उपस्थित हुए थे, बाबरी ध्वंस के बाद का गरम माहौल का लाभ लेकर कुछ विधर्मी लोग मंदिर पर हमला करने आ गये, तब सब लोग धोती ऊपर उठाकर भागे। आप आश्चर्य करेंगे, उस जैन मंदिर की सुरक्षा के लिए उस वक्त पटेल कम्युनिटी के कुछ युवा आगे आये और विधर्मियों से उसे बचा लिया। लेकिन पटेल लोगों का एक स्टेटमेंट जो था, मुझे आज भी याद है :
'यदि आप अपने मंदिरों की सुरक्षा करना नहीं जानते, तो बनाते क्यों हो?'
समझदार वो है जो पहले नंबर में चोरी हो, चोरी करने का मन हो, ऐसा कुछ रखे नहीं और यदि प्रभु भक्ति के भावों से ऐसा रखा भी हो तो सात्विक वो है जो चोरी होने ना दें।
या तो समझदार बनो या बहादुर...
लेकिन कायर की कीमत ना आज थी, ना पहले कभी थी, ना भविष्य में कभी होगी।
सम्मान हमेशा समझदार और वीर लोगही पाते हैं, बेवकूफ और कायर नहीं।










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