भविष्य का बालक? बालक का भविष्य? Part - 3
- Jan 19
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सन्-2024, U.P. में 5 साल की कामीनी की मौत हार्ट अटैक से आयी। उसी प्रकार सन्-2020 में इजिप्त में 12 साल की आयु के लड़के की मौत भी पब-जी खेलते हुए हार्ट फेल्योर से हुई। ऐसे अनेक बच्चों की डेथ के पीछे के कारणों की खोज करने पर पता चला कि वे बच्चे मोबाइल एडिक्ट हुए थे और भयावह स्ट्रेस-डिप्रेशन का सामना कर रहे थे।
कार्टून बनाने वाली कंपनियाँ, सीधा ही कोई कार्टून लॉन्च नहीं कर देती है। वे लोग अपने बनाये हुए कार्टून को देखने के लिए अलग-अलग बच्चों को बिठाते है। दिखाते है, इतना कहना पर्याप्त नहीं होगा, वे लोग बच्चों के सामने दो अलग-अलग स्क्रीन रखते है। एक स्क्रीन के ऊपर कंपनी के द्वारा बनाया गया कार्टुन प्ले किया जाता है और ठीक उस के बगल में रखी हुई दूसरी स्क्रीन के ऊपर घर में चल रहे रुटिन व्यवहार दिखाये जाते है। इतना ही नहीं दूसरी स्क्रीन के ऊपर उस बच्चे के स्वजन-परिजन-माता-पिता या भाई-बहन को भी आते-जाते दिखाते है।
कार्टून को लगातार देख रहा बच्चा यदि दो सेकण्ड या तीन सेकण्ड के लिए भी कार्टून देखना छोड़कर दूसरी स्क्रीन के ऊपर नज़र कर लेता है तो कार्टून कंपनी के चालाक टोप लेवल के लोग समझ जाते है कि अपने कार्टून के उस दृश्य में कुछ कमी है।
वे लोग तुरंत ही उस दृश्य को रिप्लेस कर के फिर से दूसरे बच्चे को वो ही कार्टून दिखाकर आगे बढ़ते है। इस प्रकार कार्टून पिक्चर को इतना आकर्षक बनाने का काम करते है कि बच्चा स्क्रीन का आकर्षण छोड न पाये, सीधा चिपक ही जाये। उन लोगों का अल्टीमेट गोल वो ही रहता है कि अपना कार्टून देखने वाला बच्चा दुनिया भूल जाना चाहिए। घर के नोर्मल रुटिन व्यवहार भी भूल जाना चाहिए। अपने माँ-बाप, भाई-भतीजे, दोस्त-वोस्त सभी को भुल जाये, सिर्फ और सिर्फ उनकी बनायी हुई डीजीटल दुनिया में ही खोया रहे। इसी एक मात्र उद्देश्य से जब वे लोग अपने बनाये प्रोग्राम्स का प्रेजन्टेशन करते है तब, अच्छे भले बच्चे भी उनकी चुंगाल में फंस जाते है। और अपना दिलो दिमाग उन्हीं स्क्रीन को समर्पित कर देते है।
आज कल कुछ बच्चों का स्क्रीन टाईम एवरेज सात घण्टे का होने लगा है। नोर्मली तीन घण्टे के एवरेज (सभी बच्चों की एवरेज) ने भी कई लोगों की निंद बिगाड़ कर रख दी है। अभी की जनरेशन Gen-Alpha है, उसे दूसरे शब्दों में आइ-पेड बेबी भी कहा जाता है। सन्-2010 से 2025 तक पैदा हुई जनरेशन को आई-पेड बेबी या Gen-Alpha कहा जाता हैं, वे बच्चे भाषा सीखने में अभी बहुत ही ज्यादा देर लगा रहे हैं और स्पेलींग मिस्टेक भी अत्यधिक करते है। इसका क्या कारण हो सकता है?
Cocomelon (कोकोमेलोन) बच्चों का प्रिय कार्टून है। कई सारे पेरेन्टस की शिकायत है कि कोकोमेलोन देखने के पश्चात् बच्चों का ब्रेन डेवलपमेंट (दिमागी विकास) स्लो हो गया है और बच्चें अत्यधिक अग्रेसीव हो रहे है। मानो कोई ड्रग एडिक्ट हो उस प्रकार रील्स और छोटी-छोटी क्लीपींग देखने में छोटे-छोटे बच्चे तीन-तीन घण्टे निकाल देते है । तीस सेकण्ड की रोल्स तीन घण्टे खा जाती है। जिंदगी खा जाती है, ऐसा भी कहा जा सकता है, क्योंकि ज़िन्दगी भी आखिर समय की ही बनी होती है।
आज कल के बच्चों को भविष्य में क्या समस्याएँ आयेगी, उसकी चर्चा करने से पहले वर्तमान में कौन-कौन सी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उस की चर्चा कर लेते है।
आज की समस्याओं को समझना इसलिए भी जरूरी हैं, क्योंकि आज की समस्या ही भविष्य की भयावह समस्या का रूप ले सकती है।
Problem No. 1) Over Stimulation of the Brain (दिमागी विकास का अवरोध हो रहा है)
आज के बच्चों की सोशल स्कील्स विकसित नहीं हो रही है, कारण?
डिजिटल अटैक...
कुछ वैज्ञानिकों ने 42 दिन तक 10 चूहों पर प्रयोग किए।
[ Researchers took 10 Rats and Continuous showed them different Sounds and Flashes for 6 hours a day ]
रिसर्चरों ने 10 चूहे लिये और लगातार उन चूहों को अलग-अलग प्रकार की आवाजें और दृश्यों को प्रतिदिन 6 घण्टों की एवरेज पर सुनाया और दिखाया गया, ऐसा 42 दिन तक किया गया।
मोबाईल फोन से होनेवाली साईड इफ़ेक्ट्स को जानने के लिए किये गये इन प्रयोगों का परिणाम भी बेहद चौकानेवाला था।
Rat’s Brain Study
1. Motor cortex
2. Visual cortex
3. Temporal lobe
It was found that all these regions of their brains were continuously activated for a very long period of time, which do not roll that much while watching the content on the screen (Pre frontal Cortex hippocampus)
संक्षिप्त में निष्कर्ष बताना चाहूँ तो दिमाग के जो भी हिस्से उन चूहों के 42 दिन दौरान काम में नहीं लगे, वे सारे सिकुड़ गये थे और चूहों के दिमाग के जो भी हिस्से लगातार सक्रिय रहे वो सारे हिस्से 42 दिन के प्रयोग के बाद भी एक्टिव रहे थे।
चौथी इन्द्रिय आँख, पाँचवी इन्द्रिय कान और छठ्ठी इन्द्रिय मन, इन तीनों इन्द्रियों के विषयों का अत्यंत आकर्षण जीव को अनादिकाल से रहा है। स्क्रीन पर आनेवाले दृश्यों से और आवाजों से चौथी, पाँचवी और छठ्ठी तीनों इन्द्रियाँ सक्रिय रहती है, जिसके कारण बच्चों में भी
1) Cognition (cognitive Skills यानी सोचने की, सीखने की कुशलता)
2) Memory Skills (याद रखने की क्षमता)
3) Critical thinking Skills (तर्कसंगत विचार करने का सामर्थ्य, गहराई में जाने की क्षमता)
4) Decision making skills (निर्णय करने की क्षमता)
5) Social skills (सामाजिक व्यवहार का कौशल) बिल्कुल भी विकसित नहीं हो पाता या क्षमता अत्यंत अल्प विकसित होती है, जिसके कारण बच्चा अकेला पड़ जाता है। इस जनरेशन का बालक व्यग्र (Depressed), उग्र (anxious) और एकाकी (lonley) बनता जा रहा है।
कई सारे कार्टून्स की अत्यधिक तेजस्वी (Bright) प्रस्तुति, अत्यधिक डार्क - उत्तेजक भड़कीले रंगो के प्रयोग (Over Saturated Colours). अत्यंत गतिशील दृश्यों (fast Strong movements) और चमकती प्रकाशकीय घटनाएँ (and intense flashes) के कारण वे सारे कार्टून्स अत्यंत नशाकारक बन जाते है।
Problem No. 2) Instant Gratification Culture and ADHD Syndrome (तुरंत मिलने वाले उपहारों की संस्कृति के साथ साथ ADHD सिन्ड्रोम का कनेक्शन।)
डोपमाइन एक ऐसा हॉर्मोन है, जिसे फीलगुड हॉर्मोन बोला जाता है (Feel Good Hormone) फीलगुड हॉर्मोन यानी प्रसन्नता का अनुभव करवाने वाला हॉर्मोन को डोपामाइन कहा जाता है। यदि अपनी मनपसंद, इच्छित चीज हमें तुरंत मिल जाती है तो हमारे दिमाग में से डोपामाइन रीलीज़ होने लगता है। जिस प्रवृत्ति से एक बार डोपामाइन रीलीज हो जाता है, तो वह प्रवृत्ति करने की प्रेरणा दिमाग की ओर से हमें बार-बार मिलती रहती है।
अभी की जनरेशन में Instant pleasure culture विकसित हो रहा है। तुरंत पाओ और तुरंत खुश हो जाओ, उसे इन्स्टन्ट प्लेजर कल्चर कहा जाता है।
पुरानी पीढी के लोगों को सब कुछ नहीं मिलता था आर जो कुछ भी मिलता था वह भी तुरंत नहीं मिलता था। एक जीवन आवश्यक पानी जैसी जरूरी चीज भी तालाब या कूवे पर लेने जाना पड़ता था।
एक कार्टून शो भी देखना होता तो ब्लैक एण्ड व्हाईट टी.वी. स्क्रीन पर सप्ताह में एकाध बार देखने को मिलता था। एक चोकलेट भी खानी होती तो मम्मी-पापा ने कहे हुए 10 काम (Home Work) कर देने पड़ते।
आज की जनरेशन रीचेस्ट जनरेशन कही जाती है। उसकी उंगलियों पर वो सब कुछ हाजिर है, जो उन्हें चाहिए, इसीलिए इस जनरेशन को फींगर टीप्स अवेबलिंटि जनरेशन कहा जाता है। उन्हें मनोरंजन यदि चाहिए तो मोबाइल फोन के उपर अमेजन प्राइम वीडियोज, नेटफ्लिक्स, यू-ट्यूब, इन्स्टा और मेटा जैसी ढेर सारी एप्प हाजिर है। उन्हें मनपसंद आइटम खानी हो तो बनाने की या ढूढने की झंझट और भेजामारी नहीं है, स्वीगी- जॉमेटो, झेप्टो जैसी अनेक ऑनलाइन फ़ूड सर्विंग एप्प हाजिर है। उन्हें खर्च करना होता है तो एक बटन दबाने पर (एक क्लिक पर) पैसे ट्रान्स्फर हो जाते है तब उसे ख्याल भी नहीं आता है, कि पैसे आते कहाँ से है?
सन् – 1960, Stanford University के प्रोफेसर, Walter Mishen, ने 4 से 5 साल की कई सैकड़ो (600 से 800) बच्चों पर एक यूनिक (विशिष्ट) प्रयोग किया। उस प्रयोग का नाम था, The Famous Marshmallow Experiment (मार्शमेलो एक मिठाई जैसी बच्चों की मनपसंद चीज है।) उस प्रयोग में अलग -अलग बच्चों को अलग-अलग कमरों में बिठाया गया और प्रत्येक बच्चे के सामने एक-एक मार्शमेलो का एक टुकड़ा रखा गया था।
बच्चों को कहा गया कि आप को 15 मिनट तक एक बार भी इस मार्शमेलो को छूना नहीं है, खाना भी नहीं है। यदि भूल से भी इस मार्शमेलो को आपने छू लिया या खा लिया तो दूसरा टुकड़ा आपको नहीं मिलेगा। यदि इसे नहीं छुयेंगे तो इस टुकड़े के अलावा दूसरा मार्शमेलो एक्स्ट्रा में मिलेगा।
One Treat Right Now
or Two Treats later Choice is yours...
(यदि आपको एक ही खाना है तो अभी एक ही मिलेगा और यदि आप धैर्य रखते हुए देरी से खाने की कोशिश करेंगे तो आपको डबल खाने को मिलेगा)
इस प्रयोग का यह मूल मंत्र था। अब पसंद आपको ही करना होगा, ऐसा बच्चों को बताया गया। आपको एक चाहिए या दो, निर्णय आपका!!! आप यदि प्रलोभन - लालच को परवश बनेंगे तो एक और यदि आपने लालच को जीता तो दो।
स्वयं बच्चों को भी पता नहीं था कि, उसकी निगरानी रखी गयी है, उस जमाने में (1960 में) सी-सी-टीवी इत्यादि से बच्चों पर वोच रखी गई और जिन-जिन बच्चों ने लालच से टच कर लिया - खा लिया उन्हें चिन्हित किया गया, और जिन्होंने बिल्कुल भी नहीं छुआ, खाने की बात तो दूर की थी, उन्हें भी चिन्हित किया गया।
आप आश्चर्य करेंगे, यह प्रयोग 40 साल तक चला था। आप कहेंगे, 15 मिनट का प्रयोग 40 साल तक कैसे चलेगा? ऐसा प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
जिन-जिन बच्चों ने प्रलोभन से खा लिया था, उन पर वोच रखी गयी तो पता चला कि, 40 साल के बाद भी वो बच्चे अपने जीवन में सफल नहीं हो पाये थे और स्थिरता के लिए संघर्ष कर रहे थे।
जिन-जिन बच्चों ने अपने मन को मजबूत कर के खाया या छुआ नहीं, उन पर भी वोच रखी गयी तो पता चला था कि 40 साल में वो बच्चे सफलता के शिखरों को छू रहे थे। अपनी जिंदगी से संतुष्ट, अपने मन से सशक्त, अपकी स्थिति में स्थिर और सब से अधिक सफल...
प्रयोग के निष्कर्ष के रूप में प्रोफेसर लिख रहे है, The reason is only one, A habit of delayed gratification (धैर्य के साथ और संघर्ष के बाद सफलता पाने की आदत ने ही उन सबकी प्रगति करवायी थी)
इमीजेट प्लेजर (तुरन्त ख़ुशी पाने की ललक) के सामने जो नहीं झुके, वे लोग अपनी लाइफ में व्यसनमुक्त भी रह पाये थे। स्ट्रेसफुल परिस्थितियों का सामना स्थिरता के साथ डटकर कर पाये थे।
इसी उम्र में दो ब्रेन की वायरिंग बनती है और ब्रेन की सिम्पल थ्योरी यही है कि, जो कार्य उसे प्रसन्नता देता है, उस कार्य को रीपीट करने का मन उसे होता ही रहता है।
The activity with which he gets the dopamine pleasure, the language of the brain is simple, whatever gets rewarded, gets repeated
खेलकूद में (Sports में) यदि सफल होना भी हो तो सख्त पुरुषार्थ और भारी श्रम के साथ अभ्यास करना अनिवार्य है।
बहोत ही धैर्य और सख्त परिश्रम के बिना कोई भी खेल में (Outdoor Games में) सफलता नहीं मिलती है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी सफलता पाने के लिए लम्बा समय अपेक्षित है, डॉक्टर बनने में 30 साल जिंदगी के पूरे हो जाते है।
Study and Sports में डोपमाइन रीलीज होने में लम्बा समय लग जाता है, लेकिन इससे बच्चों का धैर्य (पेशन्स) डेवलप होता है।
वो ही बच्चा यदि कार्टून्स या रील्स देखने लगे तो जल्दी से डोपामाइन रीलीज होने लगेगा। जल्दी से प्रसन्नता या पैसा पा लेना जोखिम भरा है। जल्दी से शीघ्रता से प्रसन्नता मिल जाने पर, शीघ्र सफलता का नशा दिमाग पर चढ़ जाता है।
जिससे बच्चे ADHD का शिकार बन जाता है। (ADHD यानी Attention, Deficit, Hyper Activity,
Disorder)
कोई भी बात हो, छाटी सी बातों में भी बच्चा एकाग्र नहीं बन पाता लेकिन उग्र बन जाता है। यानी मन पसंद माँगी हुई चीजें ना मिले तो बाकी की सारी अच्छी चीजों का भी फेकने लग जाये, तोड़ने लगे, फाड़ने लगे, तोड़-फोड़ करके घर को युद्ध का मैदान बनाने लगे, तो समझना कि बच्चा ADHD का शिकार बन चुका है। कोई जगह तो विकलांग (डीसेबल-दिव्यांग) बच्चे जो गणित या भाषा पाँचवी कक्षा में सीख लेते है वो सातवी कक्षा के सम्पूर्ण बच्चों से भी अच्छी होती है। तो जाँच का विषय है, कि ऐसा क्यों हुआ? जाँच में मिल जायेगा, मोबाइल एडिक्शन...
Problem No. 3) Lack of Sleep (बच्चों में नींद नहीं आने की समस्या)
5 साल के बच्चे को हार्ट अटैक आ जाये या सात साल की लड़की को मनोचिकित्सक की सेवा लेनी पड़े, यह आज के युग की कड़वी और ख़तरनाक हकीकत है। B.P. Level बढ़ता जाये, दिल-दिमाग कमजोर पड़ जाये। यह 5/7 साल के बच्चों के बोड़ी का रिपोर्ट है।
829 बच्चों पर स्टडी करने पर पता चला है! क्या?
बच्चों के लिए रात की नींद बहुत ही जरुरी मानी गयी है, बच्चों का पूरा विकास ही भोजन और नींद पर निर्भर करता है। रात की नींद शरीर के डेमेज को रिपेयर करने का काम करती है। मसल्स को भी रिपेयर करती है। जब बच्चे रात को मोबाइल का उपयोग करते है तब दिमाग Melatonin (मेलाटोनीन) नाम के होर्मोर्न को बनाना बंद करता है या कम कर देता है। मेलाटोनीन वह कैमिकल है, जो शरीर को स्वस्थ बनाने का कार्य करता है। (Brain stops releasing melatonin, or slow it down)
मोबाइल के कारण मेलाटोनीन बनने का कम या बंद होने पर.. बच्चों की स्लीप साइकल डिस्टर्ब हो जाती है। नींद कम होने के चक्कर में स्ट्रेस होर्मोर्न (जिसे Cortisol और Adrenaline कहा जाता है) वह रीलीज़ होना शुरु हो जाता है। स्ट्रेस होर्मोर्न रीलीज़ होने से हार्ट रेट बढाने का कार्य होता है और ब्लड प्रेशर भी, जिससे हृदय कमजोर होने लगता है और B.P. बढ़ता है (they increase the heart rate and blood pressure also)
Problem No. 4) Sexual Content for Kids (काम वासना बढ़ाने वाला कंटेंट बच्चों की जद में)
आज की जनरेशन के बच्चों पर यदि सबसे बड़ा को काई आक्रमण हो तो मेरी दृष्टि में यही है, यौनसंशा बढ़ाने के लिए रचा गया षड्यंत्र। बच्चों में यौनवृत्तियाँ भड़काने के लिए मोबाइल के अलावा शिक्षा के क्षेत्र में क्या क्या प्रयोग हो रहे है, उसकी चर्चा अगले एपिसोड में.
भविष्य का बालक और बालक का भविष्य का अंतिम एपिसोड लेकर जल्द ही आपको वापिस मिलता हूँ, तब तक आप अपना और अपने बच्चों का जरूर ख्याल रखियेगा।
(क्रमशः)










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