गुरुतत्व
- Jan 7
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जैसे जिनशासन के परमात्मा अद्वितीय हैं, वैसे ही जिनशासन में गुरुतत्त्व भी अनुपम है।
अन्य सभी दर्शनों के संन्यास की तुलना में, जिनशासन का संयम विशिष्ट है, दोषों के नाश के लिए सक्षम है।
यदि उसका पूरा वर्णन करना हो, तो एक ग्रंथ लिखना पड़ेगा।
आइए, कुछ अत्यंत अलग दिखाई देने वाली विशेषताओं को देखें...
विहार
जैन साधु का कोई भी स्थायी स्थान – मकान, आश्रम, मठ, घर नहीं होता। वे सदैव चलते रहते हैं।
इससे स्थान के ममत्व और स्थान से जुड़ी व्यक्तियों के प्रति ममत्व, और उनसे उत्पन्न होने वाले कषाय (आसक्ति, राग-द्वेष आदि)... से वे बच जाते हैं।
लोच
सिर के बाल खींचकर निकालना – यह तीव्र कष्ट शरीर के प्रति ममत्व को तोड़ता है, सुखप्रियता को घटाता है।
साथ ही, ऐसे कष्टसाध्य आचरण के कारण, लालची या सुविधा-प्रिय व्यक्ति जैन साधु नहीं बन सकता।
गोचरी (भिक्षाविधि)
खाना स्वयं नहीं बनाना... अपने लिए बना हुआ खाना भी नहीं खाना... घर-घर से थोड़ा-थोड़ा लेना, वह भी पहले से कहे बिना जाना... ऐसे आचरण से रसनेंद्रिय (जीभ) की आसक्ति पर बहुत नियंत्रण आता है... जो मिले, उसी से संतोष रखना – यह आदत बनती है।
प्रतिक्रमण
रोज़, दिन और रात में हुई भूलों–पापों को याद करके, प्रतिक्रमण (पश्चात्ताप और प्रायश्चित) करने का आचार – इससे पापों के प्रति भी घृणा बनी रहती है, निरंतर विशुद्धि का पुरुषार्थ चलता रहता है, पाप के संस्कार कम होते हैं।
अपरिग्रह
केवल संयम और शरीर-निर्वाह के लिए आवश्यक उपकरणों को ही रखना, अन्य कोई संपत्ति न रखना – यह आचार अनेक दोषों से बचा लेता है...
संपत्ति की प्राप्ति, रक्षा आदि से होने वाले संक्लेश साधु को नहीं होते।
अस्नान – अविभूषा
जीवनभर स्नान का त्याग... सभी प्रकार की सजावट का त्याग...
यह आचार ब्रह्मचर्य को निर्मल बनाए रखने में सहायक है।
विजातीय स्पर्श और परिचय का त्याग
जैन साधु स्त्री का स्पर्श नहीं करते, नहीं करने देते...
यह ब्रह्मचर्य को शुद्ध बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक आचार है।
स्पर्श तो छोडना ही है, विजातीय कि आंख में आंख डालकर देखना भी नहीं है... फोटो को देखना भी नहीं है... मधुर आवाज़ भी नहीं सुननी है...
इतनी कठोरता – यह जैन दर्शन की अद्वितीयता है।
समूह-विचरण
जैन साधु को अकेले रहने की मनाही है। अन्य साधु सदा साथ में होते हैं, जिससे एकांत में संभावित कई दोष सहज रूप से टल जाते हैं।
गुरु-निश्रा
सदैव गुरु की निश्रा में रहना... हर कार्य उनसे पूछकर करना...
यह आचार, दृष्टिराग नामक भयंकर दोष के नाश में सहायक है, साथ ही अन्य कईं दोषों से भी बचाव करता है।
अहो ! श्रामण्यम् ! ... अहो ! जिनशासनम् !










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