मार्गदर्शक गुरु
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जिनशासन का गुरुतत्त्व तो अनुपम है ही, साथ ही इसकी एक अद्भुत विशेषता यह भी है कि आत्महित का मार्गदर्शन के लिए जिस गुरु से लेना है, उन्हें सामान्य गुरु से भिन्न करता है।
जो साधु आचारों से सम्पन्न हो, वह वंदनीय है, पूजनीय है — इसमें कोई संदेह नहीं।
लेकिन आत्महित के मार्गदर्शन के लिए केवल आचारसंपन्नता पर्याप्त नहीं है।
दृष्टांत से यह बात समझ में आएगी।
यदि कार चलाने के लिए ड्राइवर चाहिए, तो वह सज्जन हो – यह तो ज़रूरी है ही — उस पर विश्वास किया जा सके, चोरी न करे, नशा न करे — यह सब तो अति-आवश्यक है।
लेकिन साथ ही उसे ड्राइविंग का ज्ञान, रास्तों की जानकारी, ट्रैफिक नियमों की समझ होनी भी आवश्यक है।
कितना भी अच्छा सज्जन, यदि ड्राइविंग न सीखा हो, तो ड्राइवर के रूपमें काम नहीं आता ।
गुरु तो जीवननैया के नाविक हैं, साधना की गाड़ी के चालक हैं।
उनमें वैराग्य, आचारसंपन्नता, करुणा जैसे गुण तो होने ही चाहिए — वरना वे अपने स्वार्थ के लिए शिष्य को गलत मार्ग पर ले जा सकते हैं।
साथ ही उन्हें आत्महित के मार्ग की (यथाशक्य) पूर्ण जानकारी भी होनी चाहिए। किस परिस्थिति में क्या करना आत्महितकारी है और क्या अहितकारी ?
जो गुरु इसको जानते ही नहीं — वे मार्गदर्शन कैसे दे सकेंगे ?
शास्त्रों में ऐसे गुरु को "गीतार्थ" कहा गया है, जो आत्महित के मार्ग को जानते हैं।
जिनशासन ने गीतार्थ के अलावा किसी अन्य साधु को उपदेश देने से मना किया है।
यदि कोई अगीतार्थ उपदेश दे, तो उसे सुनने की भी जिनशासन मनाही करता है।
यदि उनका कोई वचन सुनने में आ जाए, तो उसका स्वीकार विवेकपूर्वक करने को कहा गया है — उसका स्वीकार अनिवार्य नहीं माना गया।
गुरुतत्त्व में भी ज्ञानी-अज्ञानी (गीतार्थ-अगीतार्थ) का भेद करके, केवल गीतार्थ से ही मार्गदर्शन लेने का विधान — यह जिनशासन की अद्भुत विशेषता है।
यह परमात्मा की परम करुणा और पराकाष्ठा की सावधानी का प्रतिबिंब है।










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