परमात्मा की सर्वज्ञता
- Dec 16, 2025
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जो आत्मा या परलोक का स्वीकार ही नहीं करता, ऐसे विज्ञान के मापदंडों से आत्मा के अस्तित्व पर आधारित धर्म की जांच करना — यह समुद्र को फुटपट्टी से नापने जैसी व्यर्थ चेष्टा है। फिर भी, आज जो बातें वैज्ञानिक संशोधनों से सिद्ध हो रही हैं, वे सैकड़ों वर्ष पूर्व बिना किसी प्रयोग के जिनशासन में बताई गई थीं — यह सत्य हमें चकित कर देनेवाला है। इसलिए, ऐसी कई बाते देखतें हैं।
1. ध्वनि(Sound) की द्रव्य(पुद्गल) रूपता अन्य दर्शनों में ध्वनि को आकाश नामक द्रव्य का गुण माना गया है।
जिनशासन ने सदैव ध्वनि को द्रव्य (पुद्गल) माना है। आइंस्टाइन के समीकरण E = mc² की खोज से पहले विज्ञान ध्वनि को केवल ऊर्जा(Energy) मानता था, द्रव्य(Matter) नहीं। आइंस्टाइन ने यह सिद्ध किया कि द्रव्य और ऊर्जा एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकते हैं... (यही E = mc² का अर्थ है)
अर्थात, द्रव्य भी ऊर्जा का ही रूप है और ऊर्जा भी द्रव्य का ही रूप है।
तब से विज्ञान ने यह बात मानी कि ध्वनि भी द्रव्य रूप है, जिनशासन ने उसे किसी भी प्रयोग के बिना पहले ही प्रतिपादित किया था।
अहो ! जिनशासनम् !
2. अन्य दर्शनों में पृथ्वी, जल आदि के परमाणु अलग-अलग माने जाते हैं, एक से दूसरा नहीं बन सकता - ऐसा मानते हैं। जिनशासन कहता है कि सबका शरीर एक ही पुद्गल द्रव्य से बना है।
आज विज्ञान भी मानता है कि सभी पदार्थ इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन से बने हैं, और एक से दूसरा बनाया जा सकता है।
जिनशासन ने यह सत्य किसी भौतिक-रासायनिक प्रयोग के बिना ही बताया था, जो विज्ञान आज सैंकडो प्रयोगों के बाद बता सका है।
अहो ! जिनशासनम् !
3. हिंदू पंचांग वराहमिहिर के ग्रंथों पर आधारित है - जो भद्रबाहु स्वामी के बड़े भाई थे और जैन शास्त्र से ज्योतिष सीखे थे। आचार्यपद न मिलने के कारण साधुवेश छोडकर नैमित्तिक बने थे।
उनके गणित के आधार पर पूर्णिमा, अमावस्या, ग्रहण आदि की जो भविष्यवाणी की जाती है, वह 100% सही होती है।
बिना टेलीस्कोप के इतनी सूक्ष्म गणना जैन शास्त्रों में थी (जो आज लुप्त हो गई है) - यह तथ्य आनंद और आश्चर्य दोनों उत्पन्न करता है।
अहो ! जिनशासनम् !
4. आज से 100 वर्ष पूर्व तक भारतीय स्त्रियाँ सिर ढक कर रखती थीं। लेकिन 2500 वर्ष पूर्व प्रभु ने भविष्यवाणी की थी कि ऐसा समय आएगा जब स्त्रियाँ खुले हाथों वाले वस्त्र पहनेंगी। आज यह भविष्यवाणी शब्दशः सत्य हो रही है।
प्रभु की सर्वज्ञता का इससे बड़ा प्रमाण क्या चाहिए ?
अहो ! जिनशासनम् !










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