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धार्मिक प्रसंगों में आडंबर पर Control क्यों नहीं ?

  • 8 hours ago
  • 3 min read


प्रश्न:

जब विवाह जैसे सांसारिक प्रसंगों को सादगी से मनाने की प्रेरणा दी जाती है, तो फिर धर्मगुरु धार्मिक प्रसंगों में होने वाले इतने अधिक खर्च और आडंबर पर Control क्यों नहीं रखते?


उत्तर:

खर्च और आडंबर मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं —


1. व्यक्ति-केन्द्रित

2. भक्ति-केन्द्रित


व्यक्तिगत प्रशंसा, किसी साधु-साध्वी या गृहस्थ की वाह-वाह के लिए किया गया खर्च धर्मसम्मत नहीं माना जाता। ऐसी दिखावटी प्रवृत्ति को परमात्मा का शासन कभी स्वीकार नहीं करता।


लेकिन जो खर्च या आयोजन जैन-अजैन भाविकों को परमात्मा से जोड़ता है, उन्हें जिनशासन से जोड़ता है — उसे ‘भक्ति’ कहा गया है, उसे ‘दान’ कहा गया है।

वह व्यर्थ का खर्च नहीं, बल्कि एक प्रकार का आध्यात्मिक निवेश (Spiritual Investment) है।

उसके एक नहीं, अनेक लाभ होते हैं।


सोचिए —

हम में से अधिकांश लोग भी प्रारम्भ में ऐसे ही किसी धार्मिक प्रसंग या आयोजन के माध्यम से जिनशासन से जुड़े होंगे।


आप विश्व के किसी भी कोने में चले जाइए —

हर संस्कृति में, हर समाज में, हर धर्म में समय-समय पर उत्सव और Celebration होते ही हैं।


हजारों वर्षों से समाज को संगठित रखने और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने में ऐसे प्रसंगों की बहुत बड़ी भूमिका रही है।


यदि यह सब न होता, तो आज हम इतने संगठित, सभ्य और संतुलित समाज के रूप में शायद खड़े न होते।

इन बातों को समझने के लिए इतिहास और परंपराओं का अध्ययन आवश्यक है।


“Criticism without understanding is a sign of immaturity, not intellect…”


हाँ, यह भी उतना ही सत्य है कि धार्मिक या सांसारिक किसी भी प्रसंग में यदि —


* छह जीवनिकायों की निरर्थक और उग्र हिंसा हो,

* अनावश्यक दिखावा हो,

* पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाली वस्तुओं का उपयोग हो,

* शोर-शराबा, गंदगी या अनुशासनहीनता से किसी को कष्ट पहुँचे —


तो यह सब अवश्य रोका जाना चाहिए।


इस विषय में कोई भी विवेकी जैनाचार्य या जागरूक गृहस्थ Disagree नहीं हो सकता।


“हर वस्तु उसी प्रकार करनी चाहिए, जिस प्रकार वह शोभा देती है।”


तीनों लोक के नाथ, परम उपकारी परमात्मा का अपना एक विशेष महत्व है।

सब कुछ अत्यधिक सादगी से ही करना ही उचित हो — ऐसा भी नहीं है।


देश में विकास के अनेक आवश्यक कार्य अभी शेष होने पर भी —

राम मंदिर के निर्माण हेतु लगभग 2150 करोड़ रुपये,

महाकाल लोक कॉरिडोर के लिए लगभग 856 करोड़ रुपये,

और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लिए लगभग 800 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

इन परियोजनाओं का उद्घाटन नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया।


जैसे Education और Healthcare किसी राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक हैं, वैसे ही परमात्मा के प्रति आस्था भी सभ्यता के संतुलित विकास के लिए अनिवार्य तत्व है।


भारत में आज भी करोड़ों लोग आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे हैं, फिर भी राष्ट्र की अस्मिता और प्रतिष्ठा के लिए —

Olympic Games का आयोजन,

G20 शिखर सम्मेलन,

और बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाएँ आरंभ की जाती हैं।


क्योंकि इनसे विश्व पटल पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ती है, निवेश आता है और दीर्घकालिक लाभ प्राप्त होते हैं।


यह निश्चित है कि —

चाहे धार्मिक हो या सांसारिक, हर आयोजन विवेक और सावधानी (यतना) के साथ होना चाहिए।


सांसारिक प्रसंगों में विवेक


यदि कोई संपन्न व्यक्ति अत्यधिक कंजूसी करके समारोह करे, तो समाज में आलोचना होती है और श्रावक की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचती है।

और यदि वह अपनी सामर्थ्य से अधिक दिखावा करे, अनावश्यक खर्च करे, तो चिंता और क्लेश बढ़ते हैं तथा दूसरों पर भी अनावश्यक सामाजिक दबाव पड़ता है।


इसलिए अपने विवेक और सामर्थ्य के अनुसार मध्यम मार्ग अपनाना ही उचित है।


धार्मिक प्रसंगों में विवेक


धार्मिक आयोजनों में भी समय की आवश्यकता को समझकर खर्च करना चाहिए, जैसे —


* बच्चों में संस्कार निर्माण

* युवाओं में धर्म के प्रति रुचि जगाने वाली Activities

* तीर्थों की रक्षा

* जैन विद्यालयों का निर्माण

* भगवान महावीर के सिद्धांतों का विश्वव्यापी प्रचार

* अनुकंपा-दान के माध्यम से अजैन समाज में सकारात्मक संवाद

* साधर्मिक बंधुओं को आत्मनिर्भर बनाना

* शासन, प्रशासन और न्याय व्यवस्था में जिनशासन की सुदृढ़ उपस्थिति


यदि पारंपरिक अनुष्ठानों में होने वाले खर्च को इन आवश्यक कार्यों की ओर मोड़ना है, तो Jinshasan Awareness Seminar आवश्यक हैं।


केवल विरोध करने से दृष्टि विकसित नहीं होती।

यदि लोगों के मन में आवश्यक धार्मिक कार्यों के प्रति दूरदृष्टि उत्पन्न नहीं हुई और साथ ही पारंपरिक अनुष्ठान भी बंद कर दिए गए, तो धन का उपयोग अनुचित /पाप कार्यों में होने की संभावना बढ़ जाएगी।


यतना 


और सबसे महत्त्वपूर्ण बात —

किसी भी कार्य में यह तीन बातें अनिवार्य हैं —


* निःस्वार्थ भाव (प्रशंसा या पद-प्रतिष्ठा का मोह न हो)

* जीवदया (जीवों को न्यूनतम कष्ट पहुँचे, इसका ध्यान)

* सद्गुरु का मार्गदर्शन


इन सबके साथ ‘यतना’ — अर्थात सजगता और शुद्ध भावना — भी आवश्यक है।


यदि खर्च और आयोजन में विवेक और यतना दोनों हों, तो वे सार्थक बनते हैं।

अन्यथा वही धार्मिक प्रसंग कर्मबंध का कारण भी बन सकते हैं।

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