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Jainism is the World Best!



विश्व में धर्म और संप्रदाय अनेक हैं, लेकिन सबका लक्ष्य एक ही है –"हमारे धर्म के अनुयायी सदा सुखी रहें" और इसके लिए अच्छे विचार, वाणी और आचरण सिखाना।


  • Vision देना

  • Wisdom देना

  • Morals & Ethics कि Traning देना


इन सभी चीजों का जहाँ Presentation होता है, उस Literature को धर्मग्रंथ कहा जाता है। और इन सभी को जो सही प्रकार से आनंदपूर्वक ग्रहण करते हैं और अनुयायियों को सिखाते हैं, उन्हें धर्मगुरु कहा जाता है।एक शोध के अनुसार, वर्तमान में विश्व में लगभग 302 धर्म हैं और 3955 से अधिक संप्रदाय हैं। लेकिन उन सभी धर्मों में सर्वश्रेष्ठ धर्म कौन सा है? प्रत्येक धर्म के अनुयायी अपने ही धर्म को सर्वश्रेष्ठ कहेंगे, फिर भी यदि हम निष्पक्षता से और Deeply से विचार करें, तो 100% लगेगा कि...


सभी धर्म अच्छे हैं, लेकिन जैन धर्म सबसे उत्तम है! यह सर्वश्रेष्ठ है!


जैसे, डिफेंस सिस्टम सभी देशों के पास है, लेकिन इज़राइल की डिफेंस सिस्टम दुनिया में सबसे बेहतरीन मानी जाती है। democracy दुनिया के कई देशों में है, लेकिन भारत का democracy विश्व में सबसे उत्तम है। जैसे economy के मामले में USA सबसे आगे है, जैसे judiciary के मामले में Germany विश्व में सर्वोत्तम है,

उसी प्रकार, धार्मिक व्यवस्थाएं सभी धर्मों में अच्छी हैं, लेकिन Jainism की धार्मिक व्यवस्था World Best है!

इस बात को प्रमाणित करने के लिए कई logical आधार हैं। आइए, उनमें से कुछ को समझते हैं। 

"The Jains, like the Buddhists, do not look for a creator behind the universe; they look for a perfected state of human wisdom. Their ascetic ideals and ethical rigor have shaped India's moral consciousness for centuries."

by Zimmer, Heinrich. [German Indologist] (1951), Philosophies of India

"Jainism represents the highest ethical code of conduct and a spiritual outlook that embraces all living beings. Its teachings of Ahiṃsā and Syādvāda are among the finest intellectual and moral insights India has given to the world."

by Radhakrishnan, Sarvepalli. [Philosopher & President of India] (1923), Indian Philosophy, Vol. 1

(1) अनेकांतवाद

जैनधर्म के पास अनेकांतवाद की जो अवधारणा है, वैसी अद्भुत और गहन अवधारणा किसी अन्य दर्शन के पास नहीं है।आज मैं आपको अनेकांतवाद की एक बहुत ही basic परिभाषा बताता हूँ, इसे जीवनभर याद रखिए — यह जीवन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।

“सामने वाले व्यक्ति में जो सत्य है,सामने वाले व्यक्ति में जो श्रेष्ठ है,उसका हृदयपूर्वक स्वीकार करना — यही अनेकांतवाद है।”

परिवार हो या संघ,समाज हो या देश,धर्म हो या व्यवसाय —जिसके पास अनेकांत की समझ होगी, उसे कहीं भी कोई कठिनाई नहीं होगी।जहाँ अनेकांत उपस्थित होता है, वहाँ अशांति अपने आप समाप्त हो जाती है।

आज आपको जो भी संघर्ष और विवाद दिखाई देते हैं —चाहे वे परिवार में हों, संघ में हों, समाज में हों या देश में —उन सभी का मूल कारण केवल एक ही है :“अनेकांतवाद की समझ का अभाव।”इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।

अनेकांतवाद जिनशासन की प्रथम सीढ़ी है।इसके बिना न सम्यक्त्व है, न व्रत है, न विरति है।सभी साधनाएँ और आराधनाएँ अनेकांत के आधार पर ही खड़ी हैं।

अरे, सच्चा जैन भी उसी को कहा जा सकता है जिसके पास अनेकांतवाद की समझ हो।

स्याद्वाद मत पूरण जाणे, नय गर्भित जस वाचा रे।द्रव्य - गुण - पर्याय जो बुझे, सो ही जैन है साचा रे।।

350 गाथा का स्तवन— महोपाध्याय यशोविजयजी महाराज

किसी भी धर्म का तिरस्कार करना तो दूर,उसका सम्मान करना, उसका स्वागत करना,और साथ ही उस धर्म के जितने भी श्रेष्ठ सिद्धांत हों,उन श्रेष्ठ सिद्धांतों को भी जैनधर्म में समाहित कर लेने की जो“साहसिक उदारता” है —वह केवल जैनधर्म में ही देखने को मिलती है।

बताइए, ऐसी उदारता विश्व के और किस धर्म में देखने को मिलेगी?

"Anekantavada is the highest intelligence: it does not take sides. It remains open, fluid, and ever-learning." 

by Osho Rajneesh 



"The doctrine of Anekantavada is one of the most sophisticated intellectual developments in Indian philosophy, teaching that reality is multi-faceted." 

by Paul Dundas 

"No philosophy in the world has developed a more refined method of dealing with contradiction than Jainism’s Anekantavada." 

by Karl Potter


(2) सूक्ष्म अहिंसा

केवल किसी के शरीर को ही नहीं,बल्कि किसी की भावना को भी पीड़ा न पहुँचाना —ऐसी उत्कृष्ट और सूक्ष्म अहिंसा केवल जैनधर्म में ही बताई गई है।

कम से कम हिंसा करके,अधिक से अधिक संतोषपूर्वक जीवन कैसे जिया जाए —ऐसी जीवनशैली केवल जैनधर्म में ही दर्शाई गई है।

हेतु हिंसा = प्रमाद, अजयणा आदि के कारण होने वाली हिंसा।स्वरूप हिंसा = किसी भी जीव को मारना या उसे पीड़ा पहुँचाना।अनुबन्ध हिंसा = शुभभावपूर्वक, जिनाज्ञा के अनुसार होने वाली हिंसा।

ऐसा अद्भुत concept केवल जैनधर्म में ही बताया गया है।

दीर्घकाल तक चलने वाली हिंसा की अनवरत परंपरा को रोकने के लिए,अल्पकालीन हिंसा भी कभी-कभी स्वीकार्य मानी गई है।

हाँ, केवल इतना आवश्यक है कि उसमें —यत्न हो,आज्ञा-सापेक्षता हो,और निर्मल चित्तवृत्ति हो।

ऐसा सूक्ष्म अहिंसा का गहन ज्ञान भला और कहाँ देखने को मिलता है? 

"The more I study Jainism, the more I realize that its concept of Ahimsa is one of the greatest gifts to humanity." 

by Albert Einstein 

"The Jains were the first great practitioners of non-violence, and their message has influenced the world immensely." 

by Swami Vivekananda

"If we embraced the non-violence of Jainism, the world would evolve beyond conflict and self-destruction." 

by Nikola Tesla

(3) साधना व्यवस्था

साधु- साध्वी भगवंतों की,श्रावक- श्राविकाओं की —

2500 वर्षों से भोजन व्यवस्था,वेष व्यवस्था,विहार व्यवस्था,अध्ययन व्यवस्था जैसी सभी व्यवस्थाएँश्रमण और श्रमणियों के लिए समान रूप से, अखंड रूप में चलती आ रही हैं —इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?

और एक गृहस्थ के रूप में,आप जिन परिस्थितियों और संयोगों में बँधे हुए हों,उनमें रहते हुए भी —परिवार, व्यवसाय, शरीर आदि सभी जिम्मेदारियों को संभालते हुएआत्मसिद्धि के मार्ग पर कैसे आगे बढ़ा जाए,उसका अत्यंत व्यावहारिक (Practical) और उदार (Liberal) मार्गदर्शनहमारे जैनधर्म ने दिया है।

इन्हीं अनेक कारणों सेजैनधर्म अन्य सभी धर्मों से श्रेष्ठ प्रतीत होता है।

PROUD TO BE A JAIN!

वन्दे शासनम्।

"Jain discipline in self-control and renunciation is among the highest spiritual paths in the world." 

by Paramahansa Yogananda

"Jainism’s Sadhana is not an escape from life but an immersion into its highest truth." 

by Rabindranath Tagore

"Simplicity and self-discipline as taught in Jainism is the gateway to higher consciousness." 

by Henry David Thoreau


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