नये धर्मस्थान या विद्यामंदिर (जैन स्कूल)? वर्तमान युग में अधिक आवश्यक क्या है?
- Muni Shri Tripadiratna Vijayji Maharaj Saheb

- Jun 10
- 2 min read
Updated: Jun 11

धर्मस्थान —
पुण्य की वृद्धि कराता है,
शुभभावों की वृद्धि कराता है,
साधना में प्रगति कराता है।
और
जैन स्कूल —
गलत आदतों, कुसंस्कारों और कुसंग से बचाता है,
सात व्यसनों और कृतघ्नता जैसे बड़े पापों से बचाता है।
धर्मस्थान :
आत्मा के विकास का केंद्र है।
जैन स्कूल :
आत्मा की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।
“Development” और “Defense” —
इन दोनों में प्राथमिकता सदैव “Defense” की ही होती है।
आने वाले निकट भविष्य में अनेकों नये धर्मस्थान तो विद्यमान होंगे,लेकिन वहाँ जाने वाले जैन ही नहीं बचेंगे, तो वे धर्मस्थान का फिर क्या करेंगे??
पूर्वकाल में जैन स्कूल बनाने की आवश्यकता नहीं थी,क्योंकि पूरे भारत में गुरुकुल-व्यवस्था थी।वहाँ प्रत्येक बालक को morals, ethics, arts तथा अपने-अपने धर्म का ज्ञान सिखाया जाता था।
जीवनोपयोगी भाषाएँ, गणित, Science — सब कुछ वहीं सिखाया जाता था।इसलिए उस समय ऐसी “सुरक्षा-आपात स्थिति” नहीं थी।अतः आत्म-विकास हेतु बहुत धर्मस्थानकों का निर्माण होता था।
परंतु वर्तमान समय में “सुरक्षा-आपातकाल” को ध्यान में रखते हुए जैन स्कूलों का निर्माण होना अधिक हितकारी है।
कॉन्वेंट या अन्य स्कूलों में जाने वाला बच्चा धीरे-धीरे नास्तिक, स्वार्थी और luxurist बन जाता है।वह केवल surname से जैन रह जाता है, संस्कारों से नहीं!
प्रत्येक समझदार
• Parents को
• Donors को
• गीतार्थ गुरुभगवंतों को
• शासनानुरागी गृहस्थों को
तुरंत इसका महत्व समझकर कार्य में लग जाना होगा…अन्यथा जिनशासन के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाएगा!!
पिछले 50 वर्षों में विश्वपटल पर जो संप्रदाय अत्यंत प्रभावशाली रूप से स्थापित हुआ है, उसकी सफलता का एक प्रमुख रहस्य ‘स्वामीनारायण गुरुकुल व्यवस्था’ है।
विश्वभर में जहाँ-जहाँ उनके प्रमुख मंदिर बने हैं,वहाँ लगभग हर स्थान पर साथ में गुरुकुल भी निर्मित हुए हैं।
जो-जो धर्म विस्तार पाना चाहते हैं, टिके रहना चाहते हैं,उन सभी धर्मों को अपनी शिक्षा-व्यवस्था खड़ी करनी ही पड़ेगी।दूसरा कोई उपाय नहीं है…!
उदाहरण : Christian, Islam आदि।
Q. जैन स्कूलों में संस्कार और धर्म के साथ-साथ जो मिथ्याश्रुत भी पढ़ाया जाता है,तो उसका निर्माण करवाने या वहाँ donation देने से पाप लगता है — ऐसा कुछ लोग कहते हैं।तो क्या करना चाहिए?
A. आगमग्रंथों में बताए गए उत्सर्ग-अपवाद तथा देश-काल की औचित्य-सम्बंधी समझ का ज्ञान न होने के कारण कुछ अज्ञानी लोग ऐसी भ्रांतिपूर्ण बातें करते हैं।
अन्यथा, जैसे ऑपरेशन करने के लिए चीरा लगाना अंततः लाभकारी ही होता है,जैसे अधिक धन कमाने के लिए कुछ धन investment करना लाभ ही माना जाता है,उसी प्रकार धर्म, समाज, संस्कृति, संस्कार और शांति — इन सबके loss से बचाने हेतु,अपवाद पद से, वर्तमान परिस्थिति में विवश होकर जैन स्कूलों की स्थापना करना 100% लाभकारी ही है।
औचित्यपालन होने के कारण यह पुण्यबंध करवाने वाला कार्य है।अनेक श्रेष्ठ गीतार्थ गुरुभगवंत भी इस विचार से सहमत हैं।
तात्पर्य : जहाँ पहले से ही अनेक नये धर्मस्थान सुशोभित हैं,वहाँ अब विद्यामंदिर (जैन स्कूल) बनाने का प्रयास करना वर्तमान काल का औचित्य है।
और जहाँ अनेक जैन परिवार होने पर भी नये धर्मस्थान नहीं है,वहाँ नये धर्मस्थान का निर्माण करना भी तनिक भी गलत नहीं है।वह भी अवश्य करना चाहिए!
ऐसी बातें बहुत हो चुकीं…अब आइए, शासन में कुछ ठोस, चिरंजीवी और प्रभावशाली योगदान दें…!!













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