जहाँ-जहाँ पर विहार करके गया और जिन-जिन संघों में प्रवचन किया, वहाँ पर मैंने जब-जब एक प्रश्न सभा से पूछा, कि, अपने जैन धर्म का मुख्य सिद्धांत कौनसा है? क्या है? तब - तब मुझे अक्सर एक जवाब प्रायः सुनने में आया, ‘अहिंसा परमो धर्म:!' या फिर दूसरा जवाब ये सुनने में आया कि, ‘जीओ और जीने दो।' मुझे आश्चर्य इस बात का था कि, कई सालों से प्रवचन सुनने वालों में भी अज्ञानता किस हद तक छायी हुई है। रटा-रटाया उधार उत्तर देकर वे लोग अपने आप ही किस प्रकार संतुष्टि की साँस ले रहे थे, वो मैंने अ