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The Faithbook Blog


द्रव्य - व्यवस्था
दान के रूपमें प्राप्त (या धार्मिक सम्पत्तियों से आय रूप में प्राप्त) धार्मिक संपत्ति की व्यवस्था किस प्रकार करनी चाहिए ? इसकी एक सुदृढ़ व्यवस्था जिनशासन में है, जो अन्य किसी भी दर्शन में देखने को नहीं मिलती। अन्य दर्शनों में मंदिरों में आने वाली दान-पेटियों की आय के मालिक, मंदिर के मालिक या पुजारी बन जाते हैं... और मंदिर को अपने जीवन-निर्वाह (या ऐशो-आराम) का साधन बना देते हैं। लेकिन जिनशासन में एक अटूट सिद्धांत है – जिस कार्य के लिए दान प्राप्त हुआ हो, उसी (या वैसे ही) कार्य

Pujya Panyas Shri Bhavyasundar Vijayji Maharaj
Sep 222 min read


3 कातिल कल्चर्स
1) एज्युकेशन कल्चर – एक स्कूल के प्रिंसिपल ने डिमांड की यदि 10th की लड़कियाँ मेरे साथ दुराचार करती हैं तो मैं उन्हें पास करूंगा। एक 9...

Priyam
Sep 18, 20246 min read


पर्युषण के पांच कर्तव्य
“पर्वाणि सन्ति प्रोक्तानि, बहुनि श्री जिनागमे । पर्युषणां समं नान्यत, कर्मणां मर्मभेदकृत् ।।” भूमिका : वर्ष में (साल में) बारह मास होते है। प्राय: ऐसा कोई महिना नही जिसमें कोई पर्व न आता हो। पर्व आत्मा के परिणामों को ऊँचाई पर पहुँचाने वाला श्रेष्ठ आलंबन है। तीर्थस्थान पर जाने के बाद जैसे कितना भी लालच दे किंतु हम पाप प्रवृत्ति नही करते है वैसे पर्व के दिनों में भी हमें पाप से निवृत्ति लेनी चाहिए। आत्मा को सदा शुभ अध्यवसाय में रमण करने पर्व के दिनों में वह विशेष धर्मप्रवृत्ति

Aacharya Shri Mahabodhi Suriji Maharaj Saheb
Sep 23, 20208 min read
From the significance of daily rituals to the profound teachings of Jainism,
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