“पर्वाणि सन्ति प्रोक्तानि, बहुनि श्री जिनागमे । पर्युषणां समं नान्यत, कर्मणां मर्मभेदकृत् ।।” भूमिका : वर्ष में (साल में) बारह मास होते है। प्राय: ऐसा कोई महिना नही जिसमें कोई पर्व न आता हो। पर्व आत्मा के परिणामों को ऊँचाई पर पहुँचाने वाला श्रेष्ठ आलंबन है। तीर्थस्थान पर जाने के बाद जैसे कितना भी लालच दे किंतु हम पाप प्रवृत्ति नही करते है वैसे पर्व के दिनों में भी हमें पाप से निवृत्ति लेनी चाहिए। आत्मा को सदा शुभ अध्यवसाय में रमण करने पर्व के दिनों में वह विशेष धर्मप्रवृत्ति