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The Faithbook Blog


पर्युषण के पांच कर्तव्य
“पर्वाणि सन्ति प्रोक्तानि, बहुनि श्री जिनागमे । पर्युषणां समं नान्यत, कर्मणां मर्मभेदकृत् ।।” भूमिका : वर्ष में (साल में) बारह मास होते है। प्राय: ऐसा कोई महिना नही जिसमें कोई पर्व न आता हो। पर्व आत्मा के परिणामों को ऊँचाई पर पहुँचाने वाला श्रेष्ठ आलंबन है। तीर्थस्थान पर जाने के बाद जैसे कितना भी लालच दे किंतु हम पाप प्रवृत्ति नही करते है वैसे पर्व के दिनों में भी हमें पाप से निवृत्ति लेनी चाहिए। आत्मा को सदा शुभ अध्यवसाय में रमण करने पर्व के दिनों में वह विशेष धर्मप्रवृत्ति

Aacharya Shri Mahabodhi Suriji Maharaj Saheb
Sep 23, 20208 min read


पर्युषण की यादें… कुछ खट्टी… कुछ मीठी….
अरिहंत भगवंत के द्वारा प्राप्त जिनशासन इतना अद्भुत-अनोखा-अप्रतिम है कि जहाँ निरन्तर आत्मा के ध्येय के साथ जुड़े हुए अनेक योग हमें प्राप्त...

Panyas Shri Dhananjay Vijayji Maharaj Saheb
Sep 23, 20205 min read


क्या पर्युषण ( जैन पर्व ) आपसे प्रसन्न है ?
कुछ दिन पूर्व सुप्रीम कोर्ट में एक किस्सा पहुंचा था । झारखंड के वैद्यनाथ मंदिर के दर्शन खोलने हेतु अधिवक्ता ने सुंदर दलील पेश की थी।...

Panyas Shri Nirmohsundar Vijayji Maharaj Saheb
Sep 23, 20205 min read


क्षमा… एक अपरिचित सफर…
आज 5 अगस्त का दिन… आज क्षमामंदिर का भूमिपूजन करना है। कल की ही बात है। एक भाई ज़ोर ज़ोर से फ़ोन पर किसी को आदेश दे रहे थे। अपनी भडास...

Panyas Shri Nirmohsundar Vijayji Maharaj Saheb
Sep 23, 20206 min read
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