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Join date: Apr 2, 2025
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Jun 10, 2026 ∙ 2 min
नये धर्मस्थान या विद्यामंदिर (जैन स्कूल)? वर्तमान युग में अधिक आवश्यक क्या है?
धर्मस्थान — पुण्य की वृद्धि कराता है, शुभभावों की वृद्धि कराता है, साधना में प्रगति कराता है। और जैन स्कूल — गलत आदतों, कुसंस्कारों और कुसंग से बचाता है, सात व्यसनों और कृतघ्नता जैसे बड़े पापों से बचाता है। धर्मस्थान : आत्मा के विकास का केंद्र है। जैन स्कूल : आत्मा की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। “Development” और “Defense” — इन दोनों में प्राथमिकता सदैव “Defense” की ही होती है। आने वाले निकट भविष्य में अनेकों नये धर्मस्थान तो विद्यमान होंगे,लेकिन वहाँ जाने वाले जैन ही नहीं बचेंगे, तो वे...
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Feb 18, 2026 ∙ 3 min
धार्मिक प्रसंगों में आडंबर पर Control क्यों नहीं ?
प्रश्न: जब विवाह जैसे सांसारिक प्रसंगों को सादगी से मनाने की प्रेरणा दी जाती है, तो फिर धर्मगुरु धार्मिक प्रसंगों में होने वाले इतने अधिक खर्च और आडंबर पर Control क्यों नहीं रखते? उत्तर: खर्च और आडंबर मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं — 1. व्यक्ति-केन्द्रित 2. भक्ति-केन्द्रित व्यक्तिगत प्रशंसा, किसी साधु-साध्वी या गृहस्थ की वाह-वाह के लिए किया गया खर्च धर्मसम्मत नहीं माना जाता। ऐसी दिखावटी प्रवृत्ति को परमात्मा का शासन कभी स्वीकार नहीं करता। लेकिन जो खर्च या आयोजन जैन-अजैन भाविकों को...
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Nov 18, 2025 ∙ 2 min
चरण-स्पर्श का महत्व
भारतीय परंपरा में ‘चरण-स्पर्श’ का इतना गहरा महत्व क्यों है? चाहे परमात्मा हों, सद्गुरु हों,या माता-पिता जैसे हमारे बुज़ुर्ग हों — सबके ‘चरण-स्पर्श’ का उल्लेख हमारे कल्चर में बार-बार आता है। दिवाली जैसे पर्वों पर माता-पिता के चरण स्पर्श कर उनके आशीर्वाद लेने की परंपरा होती है... अंजनशलाका जैसे मंगल विधानों में “अनंत गुरुपादुकेभ्यो नमः” के माध्यम से सद्गुरु के ‘चरण-वंदन’ की ही बात आती है... जब हम शत्रुंजय जाते हैं — पाँच चैत्यवंदन करते हैं, दादा आदिनाथ का चैत्यवंदन करते हैं, फिर भी अलग से दादा...
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